औपनिवेशक दासता का ज्ञान-काण्ड -कृष्ण कुमार

औपनिवेशक दासता का ज्ञान-काण्ड 

कृष्ण कुमार

भारत लगभग दो सौ साल तक अग्रेंजी साम्राज्य के अधीन रहा। साम्राज्यवाद ने भारत के प्राकृतिक-भौतिक संसाधनों का केवल दोहन ही नहीं किया, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करके दिमागों और आत्मा को गुलाम बनाने की कोशिश की। ज्ञान-विज्ञान व विचारों की प्रकृति वैश्विक होती है, लेकिन साम्राज्यवाद ने शिक्षा, पाठ्यचर्या के माध्यम से उपनिवेशों के नागरिकों में हीनता पैदा करने के लिए ज्ञान को हथियार की तरह प्रयोग किया। अपनी उपलब्धियों को श्रेष्ठ-अनुकरणीय, आधुनिक-प्रगतिशील बताया तो उपनिवेशों की उपलब्धियों को हेय व पिछड़ा। इसकी प्रतिक्रिया भी हुई उससे राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ पुनरूत्थानवादी धारा भी पनपी जो उसी तरह से अपनी भाषा व संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ व अनुकरणीय मानती थी। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भारतीय बौद्धिक जगत इस गहरा संघर्ष, बेचैनी व जद्दोजहद है। 1947 में भारत राजनीतिक तौर पर तो आजाद हो गया, लेकिन साम्राज्यवाद ज्ञान की प्रणालियों-पद्धतियों में इतने गहरे तक घुसा है कि कई बार उसका अहसास भी नहीं होता। साम्राज्यवाद हमारे ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति बोध किस प्रभावित कर रहा है इस परिचर्चा के लिए कृष्ण कुमार का आलेख दे रहे हैं। इस आलेख पर सहमति-असहमति पर टिप्पणी-प्रतिक्रिया अथवा इस विषय के दूसरे पहलुओं पर आलेख भेजकर इस परिचर्चा में शामिल हों। – सम्पादक देस हरियाणा

                भारत की औपनिवेशिक दासता का जो सिलसिला प्लासी की लड़ाई से शुरू हुआ, वह लगातार जारी है। औपनिवेशिक  दासता ने हमारे व्यवहार और चिंतन को इस कदर बदल दिया है कि रेहड़ी चलाने वाले व्यक्ति से लेकर हवाई जहाज में यात्रा करने वाला हर भारतीय अमेरिका पहुंचने की जल्दी में है। वह भारत में जीता है और सपने अमेरिका के देखता है। उसका व्यक्तित्व पूर्व और पश्चिम में बंट गया है तथा पहचान, अस्तित्व और अस्मिता खो गई है।

                औपनिवेशिक दासता का प्रभाव काल विशेष तक ही नहीं रहता, बल्कि उसकी वैचारिकी युगों-युगों तक चलती रहती हैं। हम मासूम और मायूस बनकर अपने ही विरुद्ध अपने चेतना का निर्माण करते रहते हैं। पिछले तीन चार सौ सालों की घेराबंदी ने हमारे अतीत और इतिहास को ही नष्ट नहीं किया, बल्कि हमारी कल्पना के पैर कतर कर हमारी सृजनात्मकता में ठहराव पैदा कर दिया है।   ‘बदनसीबी से हमारी भाषा, स्मृति और कल्पना – चार सौ सालों से रेहन पर औपनिवेशक वर्चस्व के हवाले है। इसलिए बेतक्कलुफी से विनाश को विकास, पश्चिमीकरण को आधुनिकता और स्वयंसेवी संगठनों को आंदोलन कहा जाता है। यह ईस्ट इंडिया कम्पनी से मोसेंटो वालमार्ट तक की अनवरत औपनिवेशक यात्रा की वैचारिक-सांस्कृतिक परिणति है’।(रामाज्ञा शशिधर)

                औपनिवेशिक विचार भाषा से लेकर हमारे चिंतन और ज्ञान शिक्षण की प्रक्रियाओं तक फैला हुआ है। पिछले चार सौ सालों से वैश्विक ज्ञान में हमारी भागीदारी न के बराबर है। हमारा चिंतन और व्यवहार अलग-अलग खानों में बंट गया है। परिवार-समाज-समुदाय और शिक्षा के बीच संबंध नहीं रहा है। जीवन-व्यवहार की भाषा और शिक्षा की भाषा एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी हैं। जीवन-परिवेश से कट कर अंक बटोरु शिक्षा से तोता रटंत पैदा होते  हैं,  चिंतक और आविष्कारक नहीं। इस प्रकार हम ज्ञान के नए सृजन की बजाए पश्चिम की धुंधली फोटोस्टेट कापी बनते जा रहे हैं।

                थोपी गई विदेशी भाषा बच्चों में ऐसी मानसिकता का निर्माण कर रही है जो अपने परिवेश, समाज, परम्परा के प्रति  हीनता बोध को जन्म दे रही है। और पश्चिम की हर चीज के प्रति   मुग्ध दृष्टि से देखता है। वह सामुदायिकता और देश प्रेम जैसी भावनाओं पर भारी पड़ती है। उसका आत्मविश्वास टूटता है और व्यक्तित्व में हीनताबोध गहराने लगता है और फिर प्रयोग और अनुसंधान करने वाले हर नया कार्य पर उसके पैर डगमगाने लगते हैं। यदि वह कभी नया ज्ञान और कौशल रच भी लें, तो औपनिवेशिक पण्डितों से मान्यता प्राप्त करने की जुगत लड़ाता रहता है। उनके रहम और शासकीय कृपा को अपने ज्ञान की प्रमाणिकता मानता है।

                हमारा वर्तमान (हीनताबोध) अतीत के चिंतन और क्रियाकलापों का परिणाम है। हमें उन कड़ियों की छानबीन करनी पड़ेगी, जिन्होंने हमारे अतीत की तारतम्यता और गति को छिन्न-भिन्न करके, हमारी सोच और कल्पना को कुंद कर दिया। साम्राज्यवादी विद्वानों ने भारत को ‘सपेरों-असभ्यों-लुटेरों’ का देश कह कर मजाक उड़ाया गया। भारतीय मेधा को दरकिनार करके मैकाले का वह कथन – ‘किसी भी अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी ही पूरे भारत और अरब की सम्पूर्ण ज्ञान सम्पदा से अधिक है।’ केवल कूटनीति पर नहीं था, बल्कि हमारे दिलो-दिमाग पर साधा गया ऐसा अचूक निशाना था, जिसके घाव आज तक भरे नहीं  हैं। जवाहर लाल नेहरू की यह टिप्पणी सही कहती है कि ‘‘ मैं पूर्वी और पश्चिमी दुनिया का एक विचित्र मिश्रण बन गया हूं, हर जगह बेगानापन महसूस होता है। कहीं भी अपनेपन का अहसास नहीं होता। जीवन के सम्बंध में मेरे विचार और दृष्टिकोण उस चीज से कम मेल खाते हैं, जिसे पूर्वी कहा जाता है। मैं न तो अतीत से छुटकारा पा सकता हूं और न हाल ही से जो कुछ प्राप्त किया है। उससे पश्चिमी दुनिया में मैं अजनबी और पराया हूं। मैं उसका हिस्सा नहीं हो सकता। लेकिन खुद अपने देश में मुझे कभी-कभी निर्वासित व्यक्ति जैसा महसूस करता हूं।’’ (एन ऑटोब्योग्राफी, लंदन, 1947, पृ. 596.)

                  बार-बार दोहराया गया कि हर मायने में अंग्रेज भारतीयों से श्रेष्ठ होते हैं। उनके रंग, अक्ल और नस्ल का कोई जोड़ भारतीयों के पास नहीं है। किपलिंग की उद्घोषणा – ‘पश्चिम पश्चिम है, पूर्व पूर्व है’ के निहितार्थ पूर्व पर पश्चिम के श्रेष्ठता बोध से है। गोरे हमें लूटने नहीं, सभ्य बनाने आए हैं।

                इस श्रेष्ठताबोध ने हमारे दिमाग का ऐसा अनुकूलन किया है कि आज भी बहुत से लोग अपने किस्सों-कहानियों-वार्ताओं में उनकी न्यायप्रियता और बहादुरी की मिशाल देते हैं और समझदार लोग (चंद्रबाबू नायडू, डा. मनमोहन सिंह) दोहराते  हैं कि भारत का निर्माण अंग्रेजों ने किया। भुला दिया जाता है कि पश्चिम की वैज्ञानिक-औद्योगिक क्रांति भारतीय और अरबी ज्ञान की ऋणी है।

                साम्राज्यवाद अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिए शासित जनता के बारे जानकारी एकत्रित करके उनमें ‘छद्म चेतना’ का निर्माण करता है, ताकि गुलाम अपने जीर्णोद्वार के लिए मालिक की कृपा पर निर्भर रहे। पहले वह उद्धार की योजना के तहत कार्य करता है। वह प्राचीन संस्कृति के उद्धार के बहाने उसके रचनात्मक एवं प्रेरक तत्वों को नष्ट करता है तथा अपने ज्ञान-विज्ञान और नवीन चेतना से शासित जनता का वैचारिक नेतृत्व भी करता है, जो उनके विद्रोह एवं गुस्से को काबू में रखता है। यह मानसिक उपनिवेशीकरण इस कदर सांस्कृतिक प्रभुत्व में तबदील हो जाता है कि उपनिवेश के बुद्धिजीवी भी अपने देश को पश्चिम की दृष्टि और विचार से समझने की कोशिश करते है। और जब यह प्रक्रिया सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनकर गुडसेंस में तबदील हो जाती है तो हम साम्राज्यवाद के पैंतरों को जानने की समझ खो बैठते हैं। साम्राज्यवाद की असली विजय तब होती है जब गुलाम देश की जनता उसकी ही बोल बाणी बोलकर गर्व का अनुभव करती है। उसके जैसी बनने और संवरने की कोशिश करती है।

                स्वतंत्रता आंदोलन हमारे लिए बहुत बड़ी प्रयोगशाला है। सफलताओं, असफलताओं का विराट पुंज। गुलाम देशों में विदेशी शासन से मुक्ति के प्रतिक्रिया-स्वरूप राष्ट्रवाद का जन्म होता है। वह अतीत से ऊर्जा ग्रहण करके वर्तमान संदर्भों में उसकी पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करता है साथ ही महान अतीत एवं मिथकों के सरलीकरण से प्रतिक्रियावादी चेतना का निर्माण भी। वह सांस्कृतिक औजारों से साम्राज्यवाद से लोहा लेता है।

‘भाषा के क्षेत्र में हिन्दी की स्थिति भारत के राष्ट्रपति जैसी है और अंग्रेजी को प्रधानमंत्री की हैसियत प्राप्त है। हिन्दी एक सम्मानजनक पद पर तो है, पर व्यवहार में दूसरे दर्जे पर है और सारे अधिकार अंग्रेजी के पास हैं। हिन्दी का प्रश्न अपनी भाषा के प्रति मोह, बल्कि एक नई किस्म के उपनिवेशवादी सोच के विरुद्ध लड़ने का है।’ प्रो. नामवर सिंह की यह टिप्पणी केवल हिन्दी व भारतीय भाषाओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी भारतीय मेधा पर है।

                साम्राज्यवाद का वास्तविक उद्देश्य जनता के मानसिक जगत पर प्रभुत्व जमाकर, उसके उत्पादन पर नियंत्रण करना है। भाषा और संस्कृति के बिना मानसिक जगत पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता, इसलिए उपनिवेश की संस्कृति को मिटाकर और भाषा को टुकड़ों में तोड़ कर यह प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। आजकल हमारी भाषाओं में क्रियोलीकरण की प्रवृति बढ़ रही है तथा हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी शब्दों की भरमार है। ऐसा लगता है कि हिन्दी और लोक भाषाओं, राज्य भाषाओं से कट गया है, वे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करती नजर आती है। हमें इंग्लिश के शब्दों से कोई आपत्ति नहीं, लेकिन यदि वाक्यों में लोकभाषाओं-राज्य भाषाओं  के शब्दों की बजाए इंग्लिश के शब्दों का जोर रहेगा तो वह कबीर की बहता नीर की सधुक्कड़ी नहीं, बाजार के माल से बनी इंग्लिश बनेगी। जिसमें  जीवन का सौंदर्य एवं रस नहीं, बल्कि कृत्रिमता होगी। साथ ही जिस प्रकार अफ्रीका की भाषाओं  के व्याकरण को तोड़ कर, उनकी लिपि को नष्ट किया गया। समय के साथ वह खतरा भी हमारी भाषाओं पर मंडरा सकता है।

नए-नए मुखोटे लगाकर हमें ठगता रहता है।

                भाषा, संस्कृति व सोच में माध्यम से साम्राज्यवाद हमारे जीवन के हर पक्ष पर छा रहा है। शासक वर्ग तो ज्ञान के साम्राज्यवादी स्रोतों पर बलि बलि जाऊं वाली मुद्रा में है ही, लेकिन आमजन में भी इसका प्रभाव बढ़ रहा है। चिंता का विषय यही है

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पेज-22 व 23

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