कबीर – न जाने तेरा साहेब कैसा है

साखी – कांकर पाथर जोरि1 कै, मस्जिद लई बनाय।
तां  चढ़ी मुल्ला बांग2 दे, बहरो भयो खुदाय।।टेक

न जाने तेरा साहेब कैसा है।
चरण – मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारै, क्या साहेब तेरा बहिरा है।
चिउंटी3 के पग नेवर4 बाजै, सो भी साहेब सुनता है।।
पंडित होय के आसन मारै, लम्बी माला जपता है।
अंतर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहेब लखता5 है।।
ऊंचा नीचा महल बनाया, गहिरी नेव6 जमाता है।
चलने का मनसूबा7 नाही, रहने को मन करता है।।
कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी, गाडि़ जमीं पे धरता है।
जिस लहना8 है सो लै जैहै, पानी बहि बहि मरता है।।
सतवन्ती को गजी9 मिलै नहि, वैश्या पहिरै खासा10 है।
जेहि घर साधु भीख न पावै, भइवा खात बतासा है।।
हीरा पाय परख नहि जानै, कौड़ी परख न करता है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, हरि जैसे को तैसा है।।

  1. जोड़कर 2. अजान 3. चींटी 4. आवाज 5. देखता 6. नींव 7. इच्छा (तैयारी) 8. लेना 9. साधारण वस्त्रा (मलमल) 10. महंगे वस्त्रा

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