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कविताJune 19, 2018

कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस

किसको वतन कहूंगा? हर जगह लहूलुहान है धरती हर जगह कब्रों -सी चुप पसरी अमन कहा मैं दफऩ करूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा तोड़ डाली नानक की भुजाएं पकड़

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