कविता आओ मेरे लाल मेरी आंखों के तारो! मैं अब तुम्हारी भूख तुम्हारी रुलाई सहन नहीं कर सकती लो यह रस्सी गर्दन में डालकर झूल जाओ इस पर सुख
कविता आओ मेरे लाल मेरी आंखों के तारो! मैं अब तुम्हारी भूख तुम्हारी रुलाई सहन नहीं कर सकती लो यह रस्सी गर्दन में डालकर झूल जाओ इस पर सुख
कविता नमस्ते भतेरा ढो लिया तेरी कल्चर का बोझ, इब चलाइए ट्रैक्टर रोज। आधी धरती आधा घर, पूरी पढ़ाई, बणु अफसर। देखणी मैंने दुनिया सारी, छोड़ दी या सरम की