धर्मेन्द्र कंवारी की हरियाणवी कविता मोल की लुगाई रामफळ गेल या कै मुसीबत आई किल्ले तीन अर घरां चार भाई मां खाट म्ह पड़ी रोज सिसकै मन्नै बहू ल्यादौ, मन्नै आग्गा दिक्खै
धर्मेन्द्र कंवारी की हरियाणवी कविता मोल की लुगाई रामफळ गेल या कै मुसीबत आई किल्ले तीन अर घरां चार भाई मां खाट म्ह पड़ी रोज सिसकै मन्नै बहू ल्यादौ, मन्नै आग्गा दिक्खै
समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदली और ‘बांगरू’ भाषा के लोक नाटक (सांग), रागनी, कथाएं, गाथाएं, किस्से, कहानियां, लोक गीत, फिल्में, हास्य-व्यंग्य इतने प्रचारित-प्रसारित हुए कि एक सीमित क्षेत्र की भाषा ही हरियाणवी मानी जाने लगी। हरियाणा के प्रतिष्ठित भाषाविद् डा. बलदेव सिंह का मत है कि ‘‘यहां जिस हरियाणी की बात की जा रही है, वह सारे हरियाणा की बोली नहीं है, अपितु रोहतक और सोनीपत की बांगरू है। इसके अतिरिक्त हरियाणा के में ब्रज, मेवाती, अहीरवाटी, बागड़ी, कुरुक्षेत्र-करनाल की कौरवी आदि कई बोलियां हैं।’’