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कविताJune 26, 2018

कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं

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