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कविता न जाने कब से रूढिय़ों में कै़द समाज काला पानी की जेल लगने लगा है। हमारा विश्वास है कि बंद कोठरियों के ताले तड़ातड़ टूटने लगेंगे। घायल हथेलियों से

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