हरियाणवी अनुवाद

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कहानी  अंतोन चेखव का जन्म 19 वीं शताब्दी के रूढि़वादी रूस में हुआ था। इनकी मां के पास कहानियों का भण्डार था जिनको वो नियमित तौर पर बड़े रोचकपूर्ण तरीके

'लेकिन उसकी खोळ के टुकड़े-टुकड़े होगे। ओठै लोवै-धोरै ए नामी-गिरामी बैद रह्या करदा। कछुए की घरआळी नै वा बैद बुलाया। बैद नै एक एक करकै कछुए के खोळ के सारे टुकड़े कट्ठे करके आपस म्हं चेप दिये। यू ए कारण है के आज बी कच्छओं का खोळ खुरदरा है अर उसमें लकीर-ए-लकीर हैं।

विश्व प्रसिद्ध रुसी कहानीकार अंटोन चेखव ने अपनी प्रसिद्ध कहानी गिरगिट में शासन-प्रशासन  में फैला भ्रष्टाचार, जनता के प्रति बेरुखी और अफसरशाही की चापलूसी को उकेरा है। भारतीय संदर्भों में भी प्रासंगिक है। प्रस्तुत है इस कहानी का हरियाणवी अनुवाद। सं. ... खांसदा-खांसदा हरायुकिन बोल्या - जनाब मैं तो चुपचाप अपणै राह जाण लागर्या था। मैं अर मित्रिच लाकड़ियाँ बारे म्हं बात करण लाग रे थे के जिबे इस मरियल से कतुरिए नै मेरी आंगळी पै बुड़का भर लिया... इब देखो जी, मैं ठहर्या काम-धंधे आळा माणस ... मेरा तो काम बी आंगळियां का है, बड़े ध्यान तै करणा पड़ै। मन्नै तो हर्जाना चाहिए, इब एक हफ्ता तो मैं कुछ नीं कर सकदा, अर हो सकै है

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