दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले दिनों एक घटना घटी। वह यह कि वहाँ कुछ किसानों  ने अपना मूत्र इसलिए पी लिया था कि महीने भर तरह-तरह के प्रदर्शन के बाद भी उनकी सुनी नहीं जा रही थी।  वो तो अगले ही दिन अपना मल भी खाने वाले थे, पर शुक्र है कि उनके राज्य के मुख्यमंत्री के आश्वासन पर वे वापिस अपनी धरती पर चले गए, अन्यथा न जाने कितने संवेदनशील लोगों से कोई कौर मुंह में नहीं लिया जाता।

                जाने-माने उपन्यासकार संजीव का उपन्यास किसानों के दुख-दर्द की कथा बड़ी शिद्दत से कहता है। ‘फांस’ कभी भी चैन से जीने नहीं देती। वह चुभती रहती है और जीवन के सुख को दुख में बदलती रहती है। फांस हर उस किसान के तन-मन में चुभी है जो खेती के सहारे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना चाहता है। यह फांस खेती और कर्ज दोनों की है। खेती के कारण कर्ज लेना पड़ता है और कजऱ् के कारण खेती हो नहीं पाती। जो किसान एक बार कर्ज ले लेता है, वह ताउम्र उसकी गिरफ़्त से निकल नहीं पाता। कर्ज से किसान खाद-बीज की व्यवस्था करता है और उसी खाद-बीज की लागत निकलने में नाकामयाब रहता है।

                ‘फांस’ की एक पात्र है-शकुन। छोटी यानी कलावती और बड़ी यानी सरस्वती की मां। मोहन की पत्नी। वह एक बहुत बड़ी बात कहती है-‘इस देश का किसान कर्ज में ही जन्म लेता है, कज़ऱ् में ही जीता है, कर्ज में ही मर जाता है।’ शकुन ने यह वाक्य ऐसे ही नहीं कहा। शकुन मेहनती किसान है और अपनी गृहस्थी को संभालने वाली। वह कर्ज का पैसा लेकर बिल्कुल नहीं जीना चाहती यही वजह है कि बैंक से लिया कर्ज वह अपने गले का जेवर बेचकर उतारती है। बावजूद इसके वह अपने पति को बचा नहीं पाती।

                संजीव जी के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता ही यही है कि वे लेखन से पहले लिखे जाने वाले विषय पूरा शोध करते हैं।  छोटी यानी कलावती बड़ी यानी सरस्वती को कहती है-‘कारपोरेट-सोशल रेस्पोंसिबिलिटी इन देसी-विदेशी सेठों की जिम्मेवारी। आपूर्ति उतनी ही होती है जितने में इसका ग्राहक बचा रहे। किसी को भी किसानों की आत्महत्या की फिक्र नहीं, किसी को भी नहीं।’

                बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने किसानों को बर्बाद करने की ठानी हुई है। कम्पनियों के लिए किसान एक ग्राहक है। महज एक ग्राहक। किसानों के अर्थशास्त्र को कम्पनियों ने ही बिगाड़ा है और बिगाड़ रही हैं। कम्पनियों ने किसान को ऐसे सपने दिखाए कि उसने अपने देसी बीजों को बचाना छोड़कर सब कुछ को कम्पनियों के हवाले कर दिया। किसान को लगता है कि उसके देसी बीज कंपनियों के बीजों के आगे बहुत फीके और बेकार हैं। किसान ने पहले अपने बीज को छोड़ा और कंपनियों के बीजों पर अपनी निर्भरता कायम की। कंपनियों ने महंगे दर से बीज बेचा और कीटनाशकों के नाम पर भी खूब तबाही मचाई। कोई भी किसान इन बीजों को अपने खेतों में बोकर समृद्ध होना तो दूर, अपने जीवन को बचा ही नहीं पाया।  बाजार एक ग्राहक से नाता इतना ही रखता है जितना कि उसे मुनाफा मिलता रहे। किसान जिये कि मरे, उससे उसे कोई सरोकार नहीं।

                ‘फांस’ में  एक के बाद एक आत्महत्याएं होती है। आत्महत्याएं नहीं, हत्याएं। हत्या करने वालों के कुछ हाथ दृश्य में हैं तो कुछ अदृश्य। आत्महत्या करने वाले किसान कहीं भी किसी तरह की खैरात के भरोसे नहीं हैं। इसमें सब मेहनती और विजन वाले किसान हैं। सुनील ऐसा ही किसान है जो किसानों की आत्महत्या के विरुद्ध है। वह ऐसी योजनाएं बनाता है कि किसानों को आत्महत्या जैसा कोई कदम न उठाना पड़े। सुनील कहता था, एक भी आदमी ने अगर मेरे रहते आत्महत्या की तो मेरे जीवन को धिक्कार है। तब भी सुनील आत्महत्या कर लेता है। सुनील की योजना अलग तरह की होती है। वह किसानों को निरीह नहीं देखना चाहता।

                मशीनीकरण से किसानों ने अपने खेतों में अधिक से अधिक उपज के लिए खूब श्रम किया, तब भी खेतों से उनका पेट न भर पाया। सुनील भी अपनी योजना और मेहनत से खेतों में कुछ ऐसा करना चाहते हैं कि सबके लिए वे प्रेरणा बनें। फिर भी उन्हें एन्डो-सल्फान पीना पड़ता है। सुनील को जैसे यह कोई प्रायश्चित करना पड़ा हो। सुनील आखऱी बार अपने ही सपनों की नींव को देखते हैं और निराश होते हैं। ‘विदा मेरी बायको, विदा मेरे होनहार बेटे विजयेन्द्र, विदा मेरी बेटियो, विदा मेरे बैलो, विदा मेरे गाँव के लोगो, पाटिल जी, दोस्तो, शेतकरी परिवारो, मेरे अपने, मेरे सपने।’ कथन केवल अकेले सुनील का ही नहीं है। यह हर उस किसान का कथन है जो आत्महत्या को गले लगा रहा है।

                आत्महत्याएं इस उपन्यास में जैसे ‘उत्सव’ की तरह हैं। किसान को छोड़कर  इस उत्सव में सब शामिल हैं। सबके सब तमाशाई। सरकार, कंपनियां, गैर-सरकारी संगठन, मीडिया। सब जैसे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे। बि_ल शंकर राव, शिबू, आशा वानखेड़े, नीलू का पिता सब ऐसे किसान जो अपार संघर्ष के बाद भी अंत में हार जाते हैं। इन किसानों के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है कि वे उसे अपना लें या उसके सहारे अपने जीवन की नैया को आगे खिसका लें। वे खेती को तुरंत छोड़ देना चाहते हैं, पर मजबूर हैं। कोई आसरा न होता है तो वे भक्ति की शरण में जाते हैं और सोचते हैं कि जैसे सबका पार लगता है, उनका भी लग जायेगा। नए बीज तक के लिए उन्हें औरों के मुंह की तरफ देखना पड़ता है। उनके पास कई समस्याएं हैं। खेती को बचाए रखना। बीज के संघर्ष करना। कर्ज की चिंता। मजूरी की तलाश कि खेती से न सही, मजूरी से ही पेट भर जाए। लड़कियां और उनकी शादी की चिंता। सबमें किसान फंसा हुआ है और इस फंदे से निकलने को तड़प रहा है।  उसे कोई राह ही नहीं सूझती। वह अपने परिवार के साथ रहना चाहता है और उसके लिए तमाम कोशिशें भी करता है, तब वह सबसे आसान राह अपनाता है। वह सोचता है-जब जीवन ही नहीं रहेगा तो दुख अपने आप ही खत्म हो जायेंगे।

                किसानों के पक्ष में मीडिया कोई काम नहीं करती।  किसान उसकी टीआरपी बढ़ाने में कभी कामयाब नहीं रहे। हमारे देश में किसानों की रिकार्ड आत्महत्याएं हुई हैं, बावजूद इसके मीडिया की चुप्पी आज तक टूट नहीं पायी। ‘फांस’ में भी हमें मीडिया पर एक टिप्पणी ऐसी देखने को मिलती है जो मीडिया की भूमिका की ठीक से रेटिंग करती है। छोटी किसी बात पर बड़ी को कहती है -‘पिछले बरस सात हजार किसानों ने आत्महत्या की थी। अखबार, रेडियो, टी.वी.। सबने अफीम खा ली, खबर तक न हुई।’ छोटी की यह टिप्पणी सब प्रकार के मीडिया पर है। इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट दोनों मीडिया एक जैसे हैं।

                किसान के दुख-दर्द से मीडिया का जैसे कोई नाता न हो। ‘अफीम खा ली हो’ का मतलब यहाँ बहुत बड़ा है। मीडिया को अफीम खिलाई किसने। उन्हीं बड़े सेठों और कम्पनियों ने जिनका अंतिम लक्ष्य ही अनाप-शनाप पैसा कमाना है। उपन्यास में किसानों की लगातर होती हत्याओं की कवरेज में मीडिया को कोई रुचि नहीं है, जबकि मुंबई के फैशन शो को कवर करने के लिए मीडिया के पास खूब समय है। उसे खेतों में मरते किसानों से अधिक रैम्प पर कैटवाक करती सुंदरियां लुभाती हैं।

                संजीव जी के किसान, सुंदरियों और मीडिया से जुड़े दृश्य आपस में मिलकर एक अलग तरह का वातावरण प्रस्तुत करते है। सुंदरियों के चेहरों और बदन को निहारता कैमरा कब विदर्भ में पहुँच जाता है। एक तरफ खूब चिकने और चमकदार चेहरे हैं तो दूसरी तरफ खुरदरे और चमकहीन चेहरे हैं। मीडिया का कैमरा खुरदरे चेहरों पर रुकता ही नहीं है। उसे लॅक्मे की सुंदरियों की चाल भाती है। उस चाल की कवरेज के लिए उसे बड़े-बड़े गिफ्ट मिलने हैं। मरते हुए किसान मीडिया को क्या दे सकते हैं।

                किसानों के साथ-साथ यह उपन्यास आदिवासियों के कई मुद्दे उठता है। आदिवासी लम्बे समय से इन्हें उठाते आ रहे हैं। विकास के नाम पर आदिवासियों के संसाधनों की घेरेबंदी पोल खोलता है। महुआ, तेंदू पत्ता, बांस, सूखे मेवे आदि चीजें जिन पर मालिकाना हक सिर्फ आदिवासियों का है। ये आदिवासियों के जीवन का आधार है, लेकिन तंत्र उसे छीनने पर उतारू  है। शकुन इस पर अपना एतराज भी करती है -‘बांस बेचकर हम दो-चार पैसा कमाते हैं, मावा बेचकर भी, तेंदू के पत्ते और दूसरी चीज बेचकर भी और यहाँ दाल-भात में मूसरचंद बना हुआ है वन विभाग। उसे घूस दो तो चोरी चुपके काटो, नहीं तो छूने भी नहीं देगा। भगवान की धरती, भगवान के पेड़ और बीच में ये भंड़ुआ कौन ?’ विद्यासागर नौटियाल की एक कहानी इस उपन्यास को पढ़ते हुए बराबर याद आती है जिसमें वनरक्षक एक घासवाली को पकड लेता है और वह घास व पेटीकोट में से एक की डोरी खोलने की बात करता है तो घासवाली के दिल और दिमाग में भूखी भैंस की छवि रहती है और वह अंत में अपने पेटीकोट की डोरी खोलने की मजबूरी को चुनती है।

                किसानों से जुड़े कई सवाल हैं जिन्हें इस उपन्यास में शिद्दत से उठाया गया है। पढाई-लिखाई करने के बावजूद भी किसान के बच्चों के भविष्य की कोई गारंटी न होना। अकेले खेतों को बेच-बेचकर किसान अपने परिवार के ब्याह-शादी जैसे काम निपटाए या उन खेतों को बेचकर अपनी औलाद का कैरियर बनाये। यह एक किसान का मजबूरी में कथन है कि ‘शेत बेचकर पढ़ाया अब शेत बेचकर घूस दो। नौकरी लगेगी या नहीं कोई  गारंटी नहीं। पढ़े-लिखे लड़के शेती करना अपमान समझते हैं। शेत से गए, बेटों से गए, आमदनी से गए, उम्र से गए। और बेटे सूदखोरों की तरह सिर पर सवार।’ इसी में वे किसान बहुत समझदार माने जाते हैं जो खेतों को बेचकर अपनी औलाद को नौकरी दिलवा देते हैं। उदाहरण के तौर पर इस उपन्यास में धनौर के एक किसान दिल्लू ने अपने पांच एकड़ खेत बेचकर प्यून की नौकरी पा ली तो उसके दिन बदल गए। जिस किसान को कोई अपनी लड़की देने को तैयार न था, अब उसकी शादी हो रही है।

                विकास की चमक ने हम सबको इतना अंधा कर दिया। बैलगाडिय़ां और खेती के लिए दूसरे ठेठ साधन इसलिए लुप्त हो गए हैं कि मशीनीकरण ने अपने पैर बड़ी तेजी से फैला लिए हैं।  छोटे और भूमिहीन किसानों के पास इतने साधन नहीं हैं कि वे बिना बैंक या साहूकार के यहाँ जाए दूसरी मशीनें खरीद लें। खेती और किसान के प्रति यूँ भी हमारे विकास पुरुषों और महाजनों की राय बेहतर नहीं है।

                पूँजी के इस युग को लूट का युग कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा। किसानों को लूटने के कई तरीकों के बारे में यह उपन्यास हमें बताता है। किसान के पास जमीन ही सबसे महंगी वस्तु होती है, जिसके सहारे वह अपने परिवार की नौका को धकेलता रहता है। ज़मीन से ही उसका स्टेटस तय होता है। यदि किसी किसान के पास जमीन नहीं है, तो समझिए कि समाज और भाईचारे में उसकी प्रतिष्ठा इतनी कम हो जाती है कि कई किसान तो इसी अपमान में अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं।

                बीज किसान के लिए सबसे अधिक जरूरत की चीज हैं। हर नयी फसल के बीजों के लिए किसान के पास अपनी एक व्यवस्था होती है। किसान अपनी पैदावार में से ही कुछ गुणवत्ता वाले बीजों को अगली बार की बिजाई के लिए रख लेता है। लेकिन वैश्वीकरण के दौर में कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां रोज नए-नए ग्राहक ढूँढने में व्यस्त हुई हैं, उनकी पहली नजर ही किसान के देसी बीजों पर पड़ी है। वे अपना सबसे पहला आक्रमण ही किसान के बीजों पर करती हैं। उसके पीछे उनका उद्देश्य किसानों की आत्मनिर्भरता पर चोट करना है। पहले वे बीज खत्म करेंगे, तभी किसान की निर्भरता उन पर टिकेगी। बीज पर निर्भरता के बाद खाद और कीटनाशकों के लिए किसान को इन्हीं कम्पनियों के सामने हाथ जोडऩे पड़ेंगे।

                बैल किसान का सबसे परिश्रमी और विश्वसनीय साथी रहा है। किसान के लिए बैल महज एक पशु नहीं होता। अनेक कहानियों-उपन्यासों की तरह इस उपन्यास में भी बैल के प्रति मोहन का स्नेह देखा जा सकता है। मोहन बाघमारे तो बल्कि अपने बैल को ‘भाई’ तक कहता है। एक दिन मोहन को बैल बेचना ही पड़ता है तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसे कितनी मजबूरी में यह कदम उठाना पड़ा होगा। यही नहीं बैलों के सहारे जो सब-कुछ को बदलने की कुव्वत रखता हो, जिसने शेतकरी आंदोलन में अपना प्रतिरोध दर्ज किया हो, वह आत्महत्या का रास्ता चुनना क्यों पसंद करता है।

                मोहन एक इकाई है जो मरता है तो जाने कितने किसान मरते हुए दिखायी देते हैं। वह अकेला ही बड़बड़ाता रहता है। पेड़-पंछी आदि से घंटों बात करता रहता है। उसकी यह स्थिति किन कारणों से हुई होगी, यह किसी से छुपा नहीं है। मोहन की तरह अनेक किसान हैं जो दिनों-दिन पागलपन की अवस्था में पहुँच रहे हैं।

                किसानों के जीवन और मरण पर इसी उपन्यास में मोहन की पत्नी सिंधुताई के मुख से कही गई यह टिप्पणी गौर करने लायक है-‘मरना एक युक्ति है और जीना एक बंधन। आये दिन तो आत्महत्या की खबरें सुनते रहते हैं। जिधर देखो उधर, कोई पेड़ की डाल पर लटका पड़ा है, कोई कुएं में गिरा पड़ा है तो कोई कीटनाशक खाकर मुंह से झाग फेंक रहा है।’

                संजीव के इस उपन्यास में किसान खेती और उसके भविष्य पर पूरा विचार करते हैं। उनके इस बतियाने में कहीं कोई बड़ी मजबूरी छुपी है। किसान के सामने एक तरह से किंक त्र्व्ढ़ता की स्थिति बनी हुई है। वह करे तो क्या करे, उसकी समझ में नहीं आता। इस संदर्भ में सदा और नाना की यह बातचीत गौर करने लायक है  ”अगले साल तुम शेती छोड़ रहे हो और कुछ भी करोगे। यह बताने के लिए तुम दो-दो बीडिय़ां तोड़ चुके, माने पक्का इरादा है।’

– ‘तुम लोगों को मजाक क्यों लग रहा है ?’

‘इसलिए कि एक जज कलम की निब तोडऩे गए, कमजोर थे मेरी तरह। नहीं तोड़ पाये निब। सौ में चालीस शेतकरी ऐसे हैं जो कहते हैं कि इसी दम किसानी छोड़ दें बशर्ते उनके सामने कोई और उपाय हो और बाकी रहा तू तो तू पहली बार यह धमकी नहीं दे रहा।’

                यह है किसान का यथार्थ। खेती और जीवन छोडऩे के लिए जाने कितनी बार वह प्रयास कर चुका होता है। सबको उसका प्रयास फालतू लगता है। उसकी मजबूरी से किसी को जैसे कोई सरोकार ही नहीं होता। वह खेती छोड़े या जीवन, उससे किसी को क्या। लोन-वोन देने के लिए ‘ऋण मेले’ लगते हैं। लेकिन किसान की समस्याएं सुनने के लिए किसी तरह का कोई मेला नहीं लगता।

                सूखे की समस्या सुलझाने की बजाय सरकार किसानों को अधिक दूध वाली गायों का आबंटन करती है। गायों के लिए घास की समस्या है और गायें किसानों की मदद की बजाय उनके लिए दूसरी तरह के संकट खड़ा करती हैं। इतने ज्यादा दूध की खपत के लिए कोई ग्राहक भी चाहिए। किसानों की मूल समस्या पर ध्यान देने की बजाय उसे उपाय के नाम पर दूसरी समस्याओं में उलझाया जाता है।

                 किसान के भविष्य को जांचते-परखते हुए नयी पीढ़ी बिल्कुल नहीं चाहती कि वह खेती के जंजाल में खुद को फंसाए। उसकी नजर अपनी आमदनी के लिए स्थायी ठिकाने को तलाशने में है। वे बैल और जमीन से अपने पिता और दादाओं की तरह मोह नहीं रखते। वे महज उसे वस्तु समझते हैं और अपने लाभ के लिए उसका सौ���ा करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। मोहन बाघमारे और दूसरे किसानों के बच्चे इसीलिए खेतों का सौदा करके उन्हें अकेला छोड़कर भाग जाते हैं।

                मोहन दादा का एक बहुत मार्मिक प्रसंग इस उपन्यास में देखने को मिलता है। यहां 1936 में प्रकाशित प्रेमचन्द के उपन्यास ‘गोदान’ का होरी बराबर याद आता है। होरी का जीवन भी गाय जैसी साधारण सी चीज से संचालित होता है। यहां मोहन का भी। होरी भी जीवन भर गाय को पाने के लिए संघर्ष करता है। यहां मोहन को भी गाय के लिए बहुत बड़ा प्रायश्चित करना पड़ता है। किसानों की धर्मभीरुता इस कद्र अधिक होती है कि उन्हें कोई भी अपने ढंग से मूर्ख बनाने में सफल हो जाता है। स्वामी निरंजन देव गिरी के बताए प्रायश्चित के अनुसार ‘मोहन दादा भाई (बैल) की खाली नाद के पास खड़े हुए हैं। उनके गले जोगियों-सा एक थैला लटकाकर भाई के गले का फंदा डालकर, सिंधुताई भिक्षा का पात्र देकर भीगी नेत्रों से विदा कर रही है। पूरा गाँव मर्माहत हो उठा है।’ मोहन दादा का प्रायश्चित न टूटने पाए, को ध्यान में रखते हुए जब ‘देखो, कोई लाख पुकारे, आदमी की बोली भूलकर भी न बोलना, सिर्फ बैल की बोली—’बां…बां’ करके इशारे से बात समझाना।’ सलाहात्मक टिप्पणी दी जाती है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि मोहन दादा का बाकी का जीवन कितना जोखिम भरा होगा।  किसानों को हमने इसी स्थिति में ला छोड़ा है कि वे बां-बां करें। इस बां-बां से किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा कि किसान आखिर क्या कहना चाहता है वह ? सरकारें, योजनाकार, रिसर्च-स्कॉलर, जन-प्रतिनिधि सब इसी बां-बां को समझने में खुद को व्यस्त दिखा रहे हैं। इस बां-बां का अर्थ जिस दिन समझ में आ गया, उस दिन सब सेमिनारों, रिपोर्टों, नीतियों, योजनाओं की पोल खुल जायेगी। उस दिन महसूस होगा कि भूख सिर्फ अन्न से ही मिट सकती है जिसे हमारे देश का किसान अपने खेतों में खून-पसीने के साथ उगाता है।

                यदि सही में किसानों की फिक्र करते तो वे हर्गिज़ यह न कहते—’हम बिकाऊ हैं। हमारा सब कुछ बिकाऊ है। हमें खरीद लो। मार डालो या काट डालो। सिर्फ पेट भर भोजन और इनसान की जिंदगी दे दो हमें।’ और ना साईंपुर गाँव के लोग सरकार से लिखित अनुमति मांगते कि वे आत्महत्या करना चाहते हैं, सरकार उन्हें इसकी इजाजत दे।

                किसानों के हित में सोचने की बजाय सरकारी लोग उन पर रिपोर्टों के नाम पर जितना समय और धन खर्च करते हैं, यदि वह गंभीरता से किया जाए तो किसानों का सही में भला हो सकता है। किसानों पर केंद्रित सेमिनार में युवा पत्रकार पराग देशपांडे द्वारा प्रस्तुत जब यह रिपोर्ट ‘मैं भंडारा जिले की हकीकत बता रहा हूँ-जिस सरकार से आपने आत्महत्या करने का परमिशन मांगा है, उसी के अधिकारी हवाई जहाज से ऊपर ही मुआइना कर नाप गए – कितना पानी। 300 रुपये अनुदान मिले हैं मकान बनाने को। खुद के टॉयलेट तक के लिए लाखों और शेतकरी को पूरे मकान के लिए 300 ! चूहे की बिल भी ना बने। वाह रे तुम्हारा शेतकरी प्रेम ! कितनी मेहरबान है सरकार! भर दिया दामन वादों से! वादे! वादे! वादे!’

                उपन्यास में बनगांव, मेंडालेखा, गड़चिरोली आदि जगहें केवल महाराष्ट्र या उपन्यास की ही नहीं हैं। ये प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल हुई हैं। इस सूची में जाने कितनी जगहें शामिल हैं। यहां के किसान के सामने कोई रास्ता ऐसा नहीं है जिस पर वह चल सके और कहे कि देखो वह अपने पैरों पर चल सकता है और उसे सहारा देने के लिए देखिये कितने सारे लोग रास्ते में खड़े हैं। वह अकेला है और त्रस्त है। वह अकेला है और निराश है। वह अकेला है और मजबूर है। बावजूद इसके संजीव किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और देसी-विदेशी कम्पनियों से उन्हें बचाने के लिए आशान्वित हैं। वे चाहते हैं कि बीज जैसी मूलभूत चीजों के लिए हमारे किसानों को किसी कम्पनी का मुंह न ताकना पड़े। इसीलिये उनके पात्र छोटी व विजयेन्द्र मिलकर एक मिनी कृषि अनुसंधान केन्द्र खोलते हैं और खेती में अपनी किस्मत आजमाने वाले किसानों के लिए आशा का दीपक बनने की कोशिश में हैं।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 35 -38

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