स्त्री सृजनः अनुभव व उपलब्धियां

प्रस्तुति – अनुराधा हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान 25 फरवरी 2018 को ‘स्त्री सृजन संकल्पः उपलब्धियाँ और अनुभव’ विषय पर परिचर्चा हुई। युवा कवियत्री विपिन चौधरी, नाटक कलाकार व शिक्षाविद

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ब्रजेश कृष्ण की कविताएं

सबुकछ जानती है पृथ्वी…
ये कैसी डरावनी परछाइयाँ
कि छिप रहे हैं हम
अपनी ही चालाक हँसी के पीछे
तहस-नहस हो रहे हैं घोंसले
डूब रही है पक्षियों की आवाज
मर रहा है हवा का संगीत … Continue readingब्रजेश कृष्ण की कविताएं

खबर मिली मुझे, सृजन उत्सव की

खबर मिली मुझे, और मैं उत्सव में चला आया।
सैनी जी ने कॉल कर, उत्सव से अवगत कराया।।
सृजन से कराया अवगत, मैंने राह मेवात से पकरी।
गुरु सिद्दीक मेव संग, जा पंहुचा धर्मनगरी।। … Continue readingखबर मिली मुझे, सृजन उत्सव की

बखत पुराणा – विनोद वर्मा दुर्गेश

दस-दस कोस सफर काटते
मोटर ठेल्या का टोटा था।
रेहङू पै खेता म्है जाणा,
राबड़ी का ठंडा कलेवा था। … Continue readingबखत पुराणा – विनोद वर्मा दुर्गेश

कड़वा सच, नेक सुबह व कुण्डलियां – दयालचंद जास्ट

सिर पर ईंटें पीठ पर नवजात शिशु शिखर दुपहरी दो जून रोटी के लिए पसीने से तर-बतर यह मजदूरनी नहीं जानती कि किसे वोट करना है मालिक जहां बटन दबाएगा वोट हो जाएगा हमारे लोकतंत्र का यही है कड़वा सच स्रोत ः देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पेज- 55

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औपनिवेशक दासता का ज्ञान-काण्ड -कृष्ण कुमार

औपनिवेशक दासता का ज्ञान-काण्ड  कृष्ण कुमार भारत लगभग दो सौ साल तक अग्रेंजी साम्राज्य के अधीन रहा। साम्राज्यवाद ने भारत के प्राकृतिक-भौतिक संसाधनों का केवल दोहन ही नहीं किया, बल्कि

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मेवाती लोक जीवन की मिठास – डा. माजिद

मेवात का भौगोलिक फैलाव दिल्ली से लेकर फतेहपुर सीकरी के बीच बताया गया है, जिसमें गुड़गांव, फरीदाबाद, भरतपुर, दौसा, अलवर, मथुरा, आगरा, रेवाड़ी जिलों के बीच का भाग शामिल है। इस पूरे क्षेत्र को मेवात के नाम से जाना जाता रहा है, लेकिन आजादी के बाद पुनर्गठन हुआ और मेवात सिमट कर अलवर से लेकर सोहना तक और हथीन से लेकर तिजारा, भिवाडी तक रह गया है … Continue readingमेवाती लोक जीवन की मिठास – डा. माजिद

मोरनी: एक ऐतिहासिक झलक – सुरेन्द्रपाल सिंह

इतिहास के पन्नों से… मोरनी: एक ऐतिहासिक झलक             शिवालिक की पहाड़ियों में स्थित मोरनी नामक एक छोटे से कस्बे की सबसे ऊंची पहाड़ी पर एक किले की इमारत है,

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   रत्नकुमार सांभरिया की लघु कथाएं

लघु-कथा धर्म-धंधा             मोहल्ले का मंदिर एक अर्से से अर्द्धनिर्माण पड़ा हुआ था। दीवारें बन चुकी थीं, छत की दरकार थी। मूर्तियां प्राण-प्रतिष्ठित थीं, अतः श्रद्धालुओं की आवाजाही अनवरत जारी

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जकड़न -अशोक भाटिया

अगले दिन उन्होंने शापिंग मॉल का रुख किया। वहां वे  हबड़-तबड में सामान देखते रहे। इस बार वे काफी पैसे लेकर गए थे। पत्नी की निगाहें एक क्रीम कार्नर पर

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