प्रेमचंद – इंद्रनाथ मदान को पत्र

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प्रेमचंद अपनी नज़र मेेंं

(कोई रचनाकार-कलाकार स्वयं को कैसे देखता है। यह जानना कम दिलचस्प नहीं होता। यह भी सही है कि किसी लेखक को सिर्फ उसके साहित्य से नहीं जाना जा सकता। 1934 में इंद्रनाथ मदान को लिखे गए ये पत्र विभिन्न विषयों पर प्रेमचंद की राय उन विषयों और स्वयं प्रेमचंद को समझने में मदद करते हैं।)

प्रिय इंद्रनाथ जी,
एस्लेनेड रोड, बम्बई

7 दिसम्बर 1934

अब मैं आपके प्रश्रों पर आता हूं।

1. अपने घर की मेरी बचपन की स्मृतियां बिल्कुल साधारण हैं, न बहुत सुखी न बहुत उदास। मैं आठ साल का था, तभी मेरी मां नहीं रही। उसके पहले की मेरी स्मृतियां बहुत धुंधली हैं, कैसे मैं बैठा अपनी बीमार मां को देखता रहता था, जो उतनी ही मुहब्बती और मौका पडऩे पर उतनी कठोर थीं, जितनी कि सब अच्छी मांएं होती हैं।

2. मैंने उर्दू साप्ताहिकों में और फिर मासिकों में लिखना शुरू किया। लिखना मेरे लिए बस एक शौक की चीज थी। मुझे सपने में भी ख्याल न था कि मैं आखिरकार एक दिन लेखक बनूंगा। मैं सरकारी मुलाजिम था और अपनी छुट्टी के वक्त लिखा करता था। उपन्यासों के लिए मेरे अंदर एक न बुझने वाली भूख थी, जो कुछ मेरे हाथ लगता, मैं चट कर जाता, उसमें कोई भले-बुरे का चुनाव करने की तमीज मेरे अंदर न थी। मेरा पहला लेख सन् 1901 में और मेरी पहली किताब सन् 1903 में छपी। इस साहित्य-रचना से मुझे अपने अहंकार की तुष्टि के अलावा और कुछ न मिलता था। पहले मैं समसामयिक घटनाओं पर लिखता था फिर अपने वर्तमान और अतीत के वीरों के चरित्रों के स्केच। 1907 में मैंने उर्दू में कहानियां लिखना शुरू किया और सफलता से प्रोत्साहित होकर लिखता रहा। 1914 में दूसरों ने मेरी कहानियोंं के अनुवाद किए और वह हिन्दी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। फिर मैंने हिन्दी सीख ली और सरस्वती में लिखने लगा। उसके बाद मेरा ‘सेवासदन’ निकला और मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्र साहित्यिक जीवन बिताने लगा।

3. नहीं, मेरा किसी से कोई प्रणय नहीं हुआ। जिन्दगी बहुत उलझाने वाली थी और रोटी कमाना इतना कठिन काम कि उसमें रोमांस के लिए जगह न थी। कुछ बहुत छोटे-छोटे मामले थे जैसे कि सब के होते हैं, पर मैं उन्हें प्रेम नहीं कह सकता।

4. स्त्री का मेरा आदर्श त्याग है, सेवा है, पवित्रता है, सब कुछ एक में मिला-जुला–त्याग जिसका अंत नहीं, सेवा सदैव, सहर्ष और पवित्रता ऐसी कि कोई कभी उस पर उंगली न उठा सके।

5. मेरे दाम्पत्य जीवन में रोमांस जैसी कोई चीज नहीं है, बिल्कुल साधारण ढंग की चीज है। मेरी पहली स्त्री का देहांत 1904 में हुआ, वह एक अभागी स्त्री थी, तनिक भी सुदर्शन नहीं और यद्यपि मैं उससे संतुष्ट नहीं था तो बिना शिकवा-शिकायत निभाये चल रहा था जैसे कि सब पुराने पति करते हैं। वह जब मर गयी तो मैंने एक बाल विधवा से विवाह किया और उसके साथ काफी सुखी हूं। उसमें कुछ साहित्यिक अभिरूचि आ गई है और वह कभी-कभी कहानियां लिखती है। वह एक निडर, साहसी, समझौता न करने वाली, सीधी-सच्ची स्त्री है, दोष की सीमा तक दायित्वशील और अत्यधिक भावुक। वह असहयोग आंदोलन में शरीक हुई और जेल गयी। मैं उसके साथ सुखी हूं। ऐसी कोई चीज उससे नहीं मांगता, जो वह नहीं दे सकती। टूट भले जाए पर आप उसे झुका नहीं सकते।

6. जिंदगी मेरे लिए हमेशा काम रही है, काम, काम, काम! मैं जब सरकारी नौकरी में था तब भी अपना सारा समय साहित्य को देता था। मुझे काम करने में मजा आता है। पस्ती के क्षण आते हैं जब पैसे की समस्या आ खड़ी होती है वरना मैं अपने भाग्य से बहुत संतुष्ट हूं, अपने प्राप्य से अधिक मुझे मिला। आर्थिक दृष्टि से मैं असफल हूं, व्यवसाय मैं नहीं जानता और तंगी से मुझे कभी छुटकारा नहीं मिलता। मैं कभी पत्रकार नहीं रहा, लेकिन परिस्थितियों ने मुझे जबरन बनाया और जो कुछ मैंने साहित्य में कमाया था, जोकि बहुत नहीं था, सब पत्रकारिता में गंवा दिया।

7. कथानक मैंं इस दृष्टि से बुनता हूं कि मानव चरित्र में जो कुछ सुंदर है, मर्दाना है, वह उभरकर सामने आ जाए। यह एक उलझी हुई प्रक्रिया है, कभी इसकी प्रेरणा किसी व्यक्ति से मिलती है या किसी घटना से या किसी स्वप्न से, लेकिन मेरे लिए जरूरी है कि मेरी कहानी का कोई मनोवैज्ञानिक आधार हो। मैं मित्रों के सुझावों का सदैव सहर्ष स्वागत करता हूं।

8. मेरे अधिकांश चरित्र वास्तविक जीवन से लिए गए हैं गो उन्हें काफी अच्छी तरह पर्दे में ढंक दिया जाता है। जब तक किसी चरित्र का कुछ आधार वास्तविकता में न हो तब तक वह छाया-सा अनिश्चित-सा रहता है और उसमें विश्वास पैदा करने की ताकत नहीं आती।

9. मैं रोमों रोलां की तरह नियमित रूप से काम करने में विश्वास करता हूं।

10. हां, मेरा गोदान जल्दी ही प्रेस में जा रहा है, वह लगभग छ: सौ पृष्ठों का होगा।

आपका
प्रेम चंद

-2-

प्रिय श्री इंद्रनाथ जी,

168, सरस्वती सदन, दादर,
बम्बई-14

26 दिसम्बर 1934

आपका 16 तारीख का खत पाकर खुशी हुई। आपके सवालों के जवाब उसी क्रम में नीचे देने की कोशिश करता हूं-

1. मेरी राय में ‘रंगभूमि’ मेरी कृतियों में सबसे अच्छी है।

2. मेरे हर उपन्यास में एक आदर्श चरित्र है, जिसमें मानव दुर्बलताएं भी हैँ और गुण भी मूलत: आदर्श। प्रेमाश्रम में ज्ञानशंकर है, रंगभूमि में सूरदास है। उसी तरह कायाकल्प में चक्रधर है, कर्मभूमि में अमरकान्त है।

3. मेरी कहानियों की कुल संख्या लगभग ढाई सौ है। अप्रकाशित कहानियां मेरे पास एक भी नहीं है।

4. हां मेरे ऊपर टाल्सटाय, विक्टर ह्यूगो और रोमे रोलां का असर पड़ा है। जहां तक कहानियों की बात है, शुरू में उनकी प्रेरणा मुझे डाक्टर रविन्द्रनाथ से मिली थी। पीछे मैंने स्वयं अपनी शैली का विकास कर लिया।

5. मैंने कभी संजीदगी से नाटक लिखने की कोशिश नहीं की। मैंने एक-दो कथानकों की कल्पना की जोकि मेरे विचार में नाटक के लिए अधिक उपयोगी हो सकते थे। नाटक का महत्व समाप्त हो जाता है, अगर उसे खेला न जाए। हिन्दुस्तान के पास रंगमंच नहीं है, विशेषत: हिन्दी और उर्दू के पास। रंगमंच के नाम का मुर्दा पारसी स्टेज है जिसके नाम से मुझे हौल होता है। इसके अलावा मैं कभी नाटक की टेकनीक और रंगमंच की कला के सम्पर्क में नहीं आया। इसलिए मेरे नाटक सिर्फ पढ़े जाने के लिए थे। क्यों न मैं अपने उपन्यासों से ही चिपका रहूं, जिनमें मुझे नाटक से कहीं ज्यादा गुंजाइश अपने चरित्रों के उद्घाटन के लिए मिलती है। इसीलिए मैंने अपने विचारों के वाहन के रूप में उपन्यास को पसंद किया है। अब भी मुझे उम्मीद है कि एक-दो नाटक लिखूंगा। जहां तक आर्थिक सफलता की बात है, हिन्दी या उर्दू में यह जिन्स ढूंढे से नहीं मिलती। आप बदनाम हो सकते हैं पर आर्थिक रूप से स्वतंत्र किसी प्रकार से नहीं। हमारी जनता में किताबें खरीदने की कमजोरी नहीं है, एक तरह की मुर्दानी, उदासीनता, सुस्ती और बौद्धिक आल्स्य छाया हुआ है।

6. सिनेमा में साहित्यिक व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया कि इसमें आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकने का कुछ मौका था, लेकिन अब मैं देखता हूं कि मैं धोखे में था और मैं वापस अपने साहित्य को लौटा जा रहा हूं। सच तो यह है कि मैंने लिखना बंद नहीं किया, उसको मैं अपने जीवन का लक्ष्य समझता हूं। सिनेमा मेरे लिए वैसी ही चीज है, जैसी कि वकालत होती, अंतर इतना ही है कि यह अधिक स्वस्थ है।

7. मैं कभी जेल नहीं गया। मैं कर्मक्षेत्र का आदमी नहीं हूं। मेरी रचनाओं ने कई बार सत्ता का आक्रोश जगाया है। मेरी एक-दो किताबें जब्त हुई थीं।

8. मैं सामाजिक विकास में विश्वास रखता हूं। हमारा उद्देश्य जनमत को शिक्षित करना है। क्रांति ज्यादा समझदार उपायों की असफलता का नाम है। मेरा आदर्श समाज वह है, जिसमें सबको समान अवसर मिलें। विकास को छोड़कर और किस जरिए से हम इस मंजिल पर पहुंच सकते हैं। लोगों का चरित्र ही निर्णायक तत्व है। कोई समाज-व्यवस्था नई पनप नहीं सकती, जब तक कि हम व्यक्तिश: उन्नत न हों। कहना संदेहास्पद है कि क्रांति से हम कहां पहुंचेंगे। यह हो सकता है कि हम उनके जरिए और भी बुरी डिक्टेटरशिप पर पहुंचें, जिसमें रंचमात्र व्यक्ति-स्वाधीनता न हो। मैं रंग-ढंग सब बदल देना चाहता हूं पर ध्वंस नहीं करना चाहता। अगर मुझमें पूर्व-ज्ञान की शक्ति होती और मैं समझता कि ध्वंस के जरिए हम स्वर्गलोक में पहुंच जाएंगे तो मैं ध्वंस करने में आगा-पीछा नहीं करता।

9. सर्वहारा वर्ग में तलाक एक आम चीज है। तथाकथित ऊंचे वर्गों में ही इस समस्या ने ऐसा गंभीर रूप ले लिया है। अपने अच्छे से अच्छे रूप में विवाह एक प्रकार का समझौता और समर्पण है। अगर कोई दम्पति सुखी होना चाहते हैं, तो उन्हें एक-दूसरे का लिहाज करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसे भी लोग हैं जोकि अच्छी से अच्छी परिस्थितियों में भी कभी सुखी नहीं हो सकते। यूरोप और अमेरिका में तलाक अनहोनी चीज नहीं है। बावजूद सारी कोर्टशिप और आजादी के साथ एक-दूसरे से मिलने-जुलने के। पति-पत्नी में से किसी एक को झुकने के लिए तैयार होना ही पड़ेगा। मैं यह मानने से इंकार करता हूं कि केवल पुरुष ही दोषी है। ऐसे भी उदाहरण हैं जहां स्त्रियां झगड़ा पैदा करती हैं, तरह-तरह की शिकायतों की कल्पना कर लेती हैं। जब यह निश्चय नहीं है कि तलाक से हमारे वैवाहिक जीवन की बुराइयों का इलाज हो जाएगा तो ऐसी हालत में मैं उस चीज को समाज पर लादना नहीं चाहता। यह ठीक है कि ऐसे भी केस हैं जहां तलाक अनिवार्य हो जाता है। मगर ‘मेल न बैठना’ मेरी समझ में नकचढ़ेपन के अलावा और कुछ नहीं। तलाक जिसमें बेचारी पत्नी के लिए कोई व्यवस्था नहीं है-यह मांग केवल रुग्ण व्यक्तिवाद की ओर से आ सकती है। समता पर आधारित समाज में इस चीज के लिए कोई जगह नहीं है।

10. पहले मैं एक परम सत्ता में विश्वास करता था, विचारों के निष्कर्ष के रूप में नहीं, केवल एक चले आते हुए रूढि़वाद विश्वास के नाते। वह विश्वास अब खंडित हो रहा है। निस्संदेह विश्व के पीछे कोई हाथ है, लेकिन मैं नहीं समझता कि उसको मानव व्यापारों से कुछ लेना-देना है। उसी तरह जैसे उसे चीटियों या मक्खियों या मच्छरों के झमेलों से कुछ लेना-देना नहीं। हमने अपने आप को जो महत्व दे रखा है, उसके पीछे कोई प्रमाण नहीं है।
मुझे उम्मीद है कि फिलहाल इतना काफी होगा। मैं अंग्रेजी का पंडित नहीं हूं इसलिए मुमकिन है कि मैं जो कुछ कहना चाहता था उसे व्यक्त न कर सका होऊं लेकिन उस पर मेरा कोई वश नहीं है।

आपका
प्रेम चंद

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