विकास साल्याण – ‘दायरा’ संकीर्ण सामाजिक दायरों पर प्रहार

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सिनेमा-चर्चा


रोहतक के फि़ल्म एवम् टेलीविजन संस्थान के छात्रों द्वारा बनाई गई ‘दायरा’ फि़ल्म हरियाणवी सिनेमा को नई दिशा की ओर ले जा रही है। इस फिल्म में उस गहरे व कड़वे मुद्दे को उठाया गया है। जिसके कारण हरियाणा विश्व में प्रसिद्ध है वह मुद्दा है ऑनर-किलिंग का। जो वास्तव में बड़ा गम्भीर व संवेदनशील विषय है। लेकिन ‘दायरा’ फि़ल्म सीमित दायरे के मध्य ही पहुंच पाई।  फिल्म की चर्चा कुछ लोगों के मध्य तक सीमित न रहकर बृहद सामाजिक दायरों में चर्चा के रूप में शामिल होनी चाहिए।

फिल्म में नायिका का प्रेम-संबध था और अब वह गर्भवती हो चुकी है, यह बात उसका पिता सहन नहीं कर पाता है और परेशान रहता है और हर समय यही डर उनके चेहरे पर रहता है कि लोग क्या कहेंगे ? इसी सामाजिक डर से वह आत्महत्या कर लेता है। लडकी का भाई फौज में है वह घर छुट्टी आता है तो घर आकर पता लगता है कि पिता जी देह त्याग चुके हैं। पिता का दाह संस्कार करता हैं। उसको माता से बहन के बारे में पता लगता है तो वह भी इस बात को सहन नहीं कर पाता। इसके बाद हर रोज उसकी मां उसको हर रोज उकसाती है कि ‘इस लडकी का कुछ करो’। उस पर इतना जोर दिया है कि वह अपनी बहन को एक दिन मार डालता है ।

फि़ल्म में विभिन्न दायरों का जिक्र हुआ जो सदियों से हमारे समाज में कायम है और आज के विकासशील व प्रगतिशील कहे जाने वाले आधुनिक समाज में आज भी टूट नहीं पा रहे। वो दायरे हैं – पिता का पुत्र से , भाई का बहन से, माँ का बेटे से। एक ही परिवार में दायरों का उत्पन्न हो जाना  एक सामाजिक विंसगति है, अगर यह सच नहीं है तो वो क्या बात है जो एक पिता को आत्महत्या करने पर मजबूर कर देती है, माँ को अपनी बेटी की जहर देने पर मजबूर कर देती है, एक भाई को अपनी बहन को लकड़ी की तरह काटने पर मजबूर कर देती है।

हरियाणवी सिनेमा को एक नई दिशा व असली रंग दिया गया है। वास्तविक हरियाणा का दर्शन इस फि़ल्म में  है। पहले की हिट-हरियाणवी फिल्मो में पगडी,धोती-कुर्ता, औरतों के घागरा चुन्नी पहनना आवश्यक अंग माना जाता है और इसके अलावा आर्टीफीशियल तैयार की गई हरियाणवी साँझी व दीवार पर छोड़े गए लाल डोरे ही हरियाणवी संस्कृति की पहचान माना गया है। जो यह उन हरियाणवी संस्कृतिकर्मियो की सोच है जो पीटर-इंग्लैंड के कोट पहन कर और सिर पर पगडी लगाकर मानते हंै कि इसके बिना हरियाणा दिख ही नही सकता। इसे छोड़कर आगे बढऩा एक नई पहल है और जो असल हरियाणा पहले की फिल्मों से गायब था उसे निर्देशकीय दृष्टि ने कैमरे के माध्यम से दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया ।

अभिनय में माता व पिता के किरदार में जोरदार भूमिका निभाई है। फिल्म में एक सीन बडा बेहतरीन दिखाई देता है जब लड़के के पिता की मृत्यु के पश्चात उसका पड़ोसी उसे सीधा बात न कहकर इशारों में समझाता है। इस फिल्म में संकेतों का प्रयोग किया गया है जो कला को प्रस्तुत करने का बेहतरीन ढंग है। इसमें कई ऐसे दृश्य है जहाँ संकेतों के माध्यम से सब कुछ कह दिया है जैसे पिता की आत्महत्या से पहले उसका घर से बाहर जाना और आत्महत्या के वक्त कैमरे का फोकस केवल पंखे पर रखना, क्योंकि लटकती हुई लाश को दिखाना कोई अच्छी बात नहीं होती। लड़की का भाई जब लकडी को काट रहा है वह लकड़ी को नही उसके माध्यम अपनी बहन को काट रहा है इस समय इस दृश्य में वहाँ से बहुत सी बातें उभर कर आ रही हंै, एक तो इस समय वह जूझ रहा है क्योंकि बहन को मारना उसके लिए बड़ा कठिन है परन्तु सामाजिक दबाव के कारण ये करने को भी मजबूर है, जब कुल्हाड़ी का वार लकड़ी पर पड़ता है तो वह उछलती है। यह भी प्रतीक है कि आप अपने सामने की परिस्थितियों का जोर-जबरदस्ती से दमन कर रहे हो, आप इसका हल ढूंढने का कोई प्रयास नहीं कर रहे । संकेतों के माध्यम से दर्शकों को रोमांंचित करना सिनेमा में कला का एक नया रूप विकसित हुआ है। उम्मीद है कि हरियाणवी दर्शकों को यह संकेतात्मक भाषा जरूर समझ आ पाएगी।

हरियाणा में लड़कियों के अपने  जीवन के बारे में फैसले लेने पर भी दायरे हैं। फि़ल्म में लड़की घर से बाहर जाकर दायरा तोड़ चुकी है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( जुलाई-अगस्त, 2017, अंक-12), पेज -56

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