वर्तमान शिक्षा बालक को एक अच्छी मशीन बनाती है – प्रो. नन्द किशोर आचार्य

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वक्तव्य
प्रस्तुति- मुलख सिंह

15-16 मार्च को पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के पंजाबी विभाग की ओर से ‘शिक्षा और मानवीय विकास के संदर्भ में मातृ भाषा का योगदान’ विषय पर दो- दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया ।

इस अवसर पर बीज वक्तव्य देते हुए आई आई आई टी, हैदराबाद में प्रोफेसर ऑफ एमिनेंस, प्रोफेसर नंद किशोर आचार्य ने मातृभाषा को मानवाधिकार के संदर्भ में परिभाषित किया । उन्होंने कहा कि जीवन का हर सवाल मानवाधिकारों से संबंधित है और शिक्षा के साथ-साथ मातृभाषा में शिक्षा को भी इसी संदर्भ में लिया जाना चाहिए। हमारे यहां हर बच्चे को मातृभाषा में पाठ्य सामग्री उपलब्ध न करवाने की राज्य-व्यवस्था की नाकामी की सजा बच्चों को पढऩे में असफलता के रूप में भुगतनी पड़ रही है।

वर्तमान समय में विकास का अर्थ आर्थिक वृद्धि और आर्थिक विकास के संबद्ध किया जाता है जिसने जैविक विकास के प्रत्यय को पीछे छोड़  दिया है। एक आंकड़े के अनुसार 1950 से अब तक 220 भारतीय भाषाएं मर चुकी हैं और वे भाषाएं मुख्यधारा की भाषाओं से अलग हैं। यह बाजार आधारित विकास मॉडल ही इनके पतन का जिम्मेदार है । मातृभाषा से स्वतंत्र चिंतन पैदा होता है जो स्व, स्वाधीन, मुक्त व स्वतंत्र मन का पर्याय है। विचार भाषा से आता है और बाजार ऐसी भाषा को प्रोत्साहित करता है जो विचारहीनता पैदा करती है। विचारहीनता में दीवाना होना बहुत आसान होता है। यही दीवानापन वस्तुओं के अतार्किक उपभोग की ओर ले जाने के लिए जरूरी है जो कि बाजार की बुनियाद है ।

उन्होंने कहा कि जब आप शिक्षा की बात करते हैं तो सबसे पहले इस पर विचार किया जाना चाहिए कि आप शिक्षा के माध्यम से क्या करना चाहते हैं। शिक्षा की जिम्मेदारी किसके प्रति है? शिक्षा की जिम्मेदारी उस शिक्षार्थी के प्रति है, जो शिक्षा ग्रहण करने आता है या उस समाज के प्रति जिसका वह सदस्य है या कि शिक्षा की जिम्मेदारी राज्य और बाजार के प्रति है। हमारे यहां जो शिक्षा व्यवस्था विकसित हुई उसमें शिक्षा से यह उम्मीद की जाती है कि वह राज्य और बाजार के द्वारा जो प्रयोजन तय किये हैं, उनको पूरा करने में मददगार साबित हो। थोड़े दिनों पहले आपने देखा होगा कि अम्बानी-बिरला शिक्षा पर विचार कर रहे थे। इसका क्या अर्थ है? क्या अम्बानी और बिरला कोई शिक्षा शास्त्री हैं ? या अम्बानी और बिरला कोई दार्शनिक हैं ? वे  शिक्षा के इन कार्यक्रमों के आधार पर क्या चलाना चाह रहे हैं! सीधी-सी बात है अम्बानी और बिड़ला हमारे यहां बाजार के प्रतिनिधि हैं और वे उसी आधार पर शिक्षा पर विचार कर रहे हैं और राज्य उनसे  रिपोर्ट मांग रहा है तो इसका क्या अभिप्राय है! यानी कि राज्य क्या लागू करना चाहता है!  तो राज्य हुआ या बाजार का एजेन्ट?

अभी हमारे यहां जो व्यवस्था है उसमें शिक्षा राज्य के मुताबिक चलती है और राज्य बाजार के मुताबिक, तात्पर्य यह है कि शिक्षा राज्य के माफऱ्त बाजार के मुताबिक चल रही है। यहां शिक्षा का उद्देश्य न तो शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का विकास है न आन्तरिक गुणों का विकास।

 यहां शिक्षा का उद्देश्य  उसको बाज़ार  के योग्य बनाना है, यानी वह बाजार की उत्पादन प्रणाली में सहायक हो और  बाजार का उपभोक्ता बन जाए। हमारी सारी शिक्षा-प्रणाली उसके व्यक्तित्व को उपभोग परक बना रही है। अगर यह प्रक्रिया है तो मनुष्य के स्वतंत्र विकास का सवाल ही कहां है ? जब आप नैतिक विकास की बात करते हैं तो यह देखना होगा कि क्या बाजार की इस व्यवस्था में नैतिक विकास संभव है! अगर वहां किसी तरह की नैतिकता होगी तो वह बाजार के ही काम की होगी वह मनुष्य के विकास के काम की नहीं होगी। वहां ईमानदारी की बात भी बाजार के प्रति होगी, मूल्यों के प्रति नहीं।

वर्तमान शिक्षा बालक को एक अच्छी मशीन बनाती है और अच्छी मशीन वह है जो सोचती नहीं और बिना रुके अधिक उत्पादन करती है; अपने कार्य में निपुण है। दुनिया का हर शिक्षा-शास्त्री और बाल मनोविज्ञान का जानकार कहता है कि बच्चे को मातृभाषा में शिक्षा दो जबकि बाजार कहता है कि उसे उस भाषा में शिक्षा दो जिससे वह उसका एक अच्छा एजेंट बन सके।

 इसमें परिवर्तन कैसे हो, उन्होंने कहा कि मुख्य बात तो कंटेंट में परिवर्तन की है। उसकी प्रक्रियाओं में परिवर्तन की आवश्यकता है, जिससे कि बालक में नैतिक चेतना का विकास संभव हो सके। लेकिन वो शायद बाजार भी नहीं चाहता और राज्य भी नहीं चाहता। राज्य व्यक्ति को स्वतंत्र नहीं देखना चाहता और बाजार व्यक्ति को नैतिक नहीं देखना चाहता। इसलिये दोनों चीजें संभव ही नहीं हैं। खास तौर से उस शिक्षा के लिए जो राज्य और बाजार  के सहारे चल रही हो। पिछले दिनों देश के विकास का नारा बार-बार उछाला जाता रहा है। देश का विकास तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सके जो वह दे सकता है न कि वैसा,जैसा कि सत्ताधारी उससे चाहते हैं।

 विशेष अतिथि के तौर पर संगोष्ठी में उपस्थित पंजाबी के प्रसिद्ध कवि सुरजीत पातर ने कविताओं के माध्यम से मानवता की उस भयानक पीड़ा को प्रकट किया जिससे कि उत्पादन के बदलते साधन शब्दों की विविधता को निगल रहे हैं और मानव अपने आप से बेगाना हो रहा है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा( मई-जून 2016) पेज- 62

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