कर्मचन्द ‘केसर’-तखत बदलग्ये, ताज बदलग्ये

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हरियाणवी ग़ज़ल


तखत बदलग्ये, ताज बदलग्ये।
रजवाड्याँ के राज बदलग्ये।

सुख-दुक्ख म्हं थे साथी लोग,
इब आपस की लिहाज बदलग्ये।

बीन-बांसरी ढोल नगाड़े,
गाण-बजाण के साज बदलग्ये।

कच्चे-पक्के स्वाद घणे थे,
दूध-दहीं अर नाज बदलग्ये।

कौण बणावै ताजमहल इब,
शाहजां अर मुमताज बदलग्ये।

सही पड़ै थी गरमी-सरदी,
मौसम के मिजाज बदलग्ये।
गाम-गाम म्हं बैंक खुले सैं,
पह्लां आले ब्याज बदलग्ये।

कुलड़े-फरवी थाल टोकणी,
ओक्खल मुस्सल छाज बदलग्ये।

जनम-मरण अर ब्याह् शादी के,
सारे रीत-रिवाज बदलग्ये।

बिन माणस के चाल्लण लाग्गै,
पनडुब्बी अर जहाज बदलग्ये।

कौण हाथ तै काम करै इब,
मशीनां गेल्याँ काज बदलग्ये।

नाड़ी-बैद रह्ये ना स्याणे,
सब रोगां के ल्याज बदलग्ये।

बेटा-बेटी बह्ण बह्णोई,
सबकै नखरे-नाज बदलग्ये।

पाणी का रंग बदल्या कोन्या,
पीणे आले आज बदलग्ये।

‘केसर’ इब तो तेरे भी यें,
जीणे के अन्दाज बदलग्ये।

 

 

 

 

 

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