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हरियाणवी कविता

विपिन चौधरी – ओबरा

हरियाणवी कविता जद ताती-ताती लू चालैं नासां तैं चाली नकसीर ओबरे म्हं जा शरण लेंदे सिरहानै धरा कोरा घड़ा ल्हासी-राबड़ी पी कीं काळजे म्हं पड़दी ठंड एक कानीं बुखारी म्हं बाळू...

विपिन चौधरी – डाब के खेत

हरियाणवी कविता डाब कै म्हारे खेतां म्हं मूंग, मोठ लहरावे सै काचर, सिरटे और मतीरे धापली कै मन भावै सै रै देखो टिब्बे तळै क्यूकर झूमी बाजरी रै। बरसे सामण...

विपिन चौधरी – मेरा सादा गाम

 हरियाणवी कविता म्हारी बुग्गी गाड्डी के पहिये लोहे के सैं जमां चपटे बिना हवा के जूए कै सेतीं जुड़ रहे सैं मण हामी इसे म्हं बैठ उरै ताईं पहोंच...

रोशन लाल श्योराण – यादें

कविता वो बचपन के दिन कड़ै गए, वो छूटे साथी कड़ै गए, मैं ढूंढू उनको गळी-गळी वो यारे प्यारे कड़ै गए। वो खुडिया-डंडा, वो लुका छिपी वो तीज और गुग्गा...

सरपंची – जसबीर लाठरों

हरियाणवी कविता गाम मां सरपंची के लेक्शन का, घणा इ रोळा ओर्या था, जोणसा बी लेक्शन मां खड्या था, ओइयो बोळा ओर्या था, भरतु शराबी देसी दारू...

विपिन चौधरी – टूम ठेकरी

हरियाणवी कविता जी करै सै आज दादी की तिजोरी मैं तै काढ़ ल्याऊं सिर की सार,धूमर अर डांडे नाक की नाथ, पोलरा कान की बुजली, कोकरू अर डांडीये गळे की-नौलड़ी,गळसरी, गंठी,...

सहीराम – संघर्ष कथा

आंखिन देखी मैं कहता हूं, सुनी सुनायी झूठ कहाय। गाम राम की कथा सुनाऊं, पंचों सुनियो ध्यान लगाय। हल और बल कुदाली कस्सी, धान बाजरा फसल...

राजकुमार जांगड़ा ‘राज’ – अन्नदाता

क्यूं काम करणियाँ भूखे सोवे,हामने या बता दो रै । क्यूं ठाडे के दो बॉन्डे हो से ,कोई तो समझा दो रै । कमा कमा के...

विपिन चौधरी -गांव की छोरियां

हरियाणवी कविता गोबर चुगणे नै गांव की छोरियां खेल समझैं तो बड़ी बात कोनी ऊपर ताईं गोबर भरा तांसळा खेल-खेल म्हं भर लिया काम का काम भी होग्या अर खेल का...

बेखौफ सोच – सुभाष चंद्र (रविंद्रनाथ टैगोर की चित्त जहां भय शून्य का...

हरियाणवी अनुवाद जडै सोच हो बेखौफ, स्वाभिमान हो जड़ै, जडैं ज्ञान हो आजाद, घर-आंगण में संकीर्ण भीत ना खड़ै जड़ै ना बंडै धरती हररोज छोट-छोटे टुकड़्यां टुकड़्यां म्हं ...