placeholder

उत्तर-दक्षिण भाषा-सेतु के वास्तुकार: मोटूरि सत्यनारायण – प्रो. अमरनाथ

Post Views: 82 आजादी के आन्दोलन के दौरान गाँधी जी के साथ हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में विकसित करने का जिन लोगों ने सपना देखा और उसके लिए आजीवन…

placeholder

सरकारी सेवाओं से मातृभाषाओं की बिदाई – डॉ. अमरनाथ

Post Views: 108 यूपी बोर्ड की परीक्षा में आठ लाख विद्यार्थियों का हिन्दी में फेल होने का समाचार 2020 में सुर्खियों में था. कुछ दिन बाद जब यूपीपीएससी का रेजल्ट…

placeholder

त्योहारी कुण्डलियाँ- सत्यवीर नाहडिय़ा

सत्यवीर नाहडिय़ा- रेवाड़ी जिले के नाहड़ गांव में 15 फरवरी, 1971 को जन्म। एम.एस.सी और बी.एड. की उपाधि। “लोक-राग” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित। चंडीगढ़ से “दैनिक ट्रिब्यून” में ‘बोल बखत के’ नाम से दैनिक-स्तंभ। हरियाणवी फिल्मों में संवाद-लेखन। रा.व.मा.व. बीकेपुर रेवाड़ी में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक के पद पर सेवारत।

placeholder

विज्ञान को हिन्दी में सुलभ कराने वाले हिंदी के अप्रतिम योद्धा : गुणाकर मुले – प्रो. अमरनाथ

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)

placeholder

हिन्दी के लिए लड़ने वाला सबसे बड़ा योद्धा : महात्मा गाँधी – अमरनाथ

गाँधी जी ने हिन्दी के आन्दोलन को आजादी के आन्दोलन से जोड़ दिया था. उनका ख्याल था कि देश जब आजाद होगा तो उसकी एक राष्ट्रभाषा होगी और वह राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी होगी क्योंकि वह इस देश की सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा है. वह अत्यंत सरल है और उसमें भारतीय विरासत को वहन करने की क्षमता है. उसके पास देवनागरी जैसी वैज्ञानिक लिपि भी है. जो फारसी लिपि जानते हैं वे इस भाषा को फारसी लिपि में लिखते हैं. इसे हिन्दी कहें या हिन्दुस्तानी.

placeholder

हिन्दुस्तान की जातीय भाषा के अन्वेषक जॉन गिलक्रिस्ट – अमर नाथ

जॉन बोर्थविक गिलक्रिस्ट ( जन्म- 19.6.1759 ) ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान की जातीय भाषा की सबसे पहले पहचान की, उसके महत्व को रेखांकित किया, भारत में उसके अध्ययन की नींव रखी, उसका व्याकरण बनाया और इंग्लिश- हिन्दुस्तानी डिक्शनरी बनाकर अध्ययन करने वालों के लिए रास्ता आसान कर दिया. एडिनबरा में जन्म लेने वाले जॉन गिलक्रिस्ट वास्तव में एक डॉक्टर थे और ईस्ट इंडिया कम्पनी में सर्जन बनकर 1783 ई. में भारत आए.

लोक साहित्य : प्रतिरोध की चेतना ही उसकी समृद्धि है – डॉ. अमरनाथ

लोक साहित्य में लोक जीवन का यथार्थ है, पीड़ा है, दुख है, मगर उस दुख और पीड़ा से जूझने का संकल्प भी है, मुठभेड़ करने का साहस भी है. यहां सादगी है, प्रेम है, निष्ठा है, ईमानदारी है और सुसंस्कार है. हमारे लोक साहित्य में लोक का जो उदात्त चरित्र चित्रित है वह शिष्ट साहित्य में दुर्लभ है. शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य के बीच का फासला वस्तुत: दो वर्गों के बीच का फासला है.

placeholder

गाँधी की राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी कहाँ गई ? – अमरनाथ

आजादी के बहत्तर साल बीत गए. आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति. दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकरे प्रशासनिक व्यवस्था तक सबकुछ पराई भाषा में होता है फिर भी उम्मीद की जाती है कि वह विश्व गुरु बन जाएगा.