placeholder

अंधेरे में – गजानन माधव मुक्तिबोध

Post Views: 2 ज़िन्दगी के…कमरों में अँधेरेलगाता है चक्करकोई एक लगातार;आवाज़ पैरों की देती है सुनाईबार-बार….बार-बार,वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,किन्तु वह रहा घूमतिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,भीत-पार आती…

placeholder

एक रग का राग – गजानन माधव मुक्तिबोध

Post Views: 3 ज़माने की वक़त और बेवक़तधड़कती धुकधुकीनाड़ियाँ फड़कती देखकरखुश हुए हम किबगासी और उमस के स्वेद मेंभीगी हुई उकताहट-उचाट खत्म हुईऔर कुछ ज़ोरदारसनसनीखेज कुछ,गरम-गरम चाय के साथ-साथमिल गई…

placeholder

भूल-गलती – गजानन माधव मुक्तिबोध

Post Views: 2 भूल-गलतीआज बैठी है जिरहबख्तर पहनकरतख्त पर दिल के;चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,खड़ी हैं सिर झुकाए         …

placeholder

हरिजन गाथा – नागार्जुन

Post Views: 5 कविता (1) ऐसा तो कभी नहीं हुआ था !महसूस करने लगीं वेएक अनोखी बेचैनीएक अपूर्व आकुलताउनकी गर्भकुक्षियों के अन्दरबार-बार उठने लगी टीसेंलगाने लगे दौड़ उनके भ्रूणअंदर ही अंदरऐसा…

placeholder

प्रतिबद्ध हूँ, संबद्ध हूँ, आबद्ध हूँ – नागार्जुन

Post Views: 3 कविता प्रतिबद्ध हूँसंबद्ध हूँआबद्ध हूँ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ –बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त –संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ…अविवेकी भीड़ की ‘भेड़या-धसान’…

placeholder

कालिदास – नागार्जुन

Post Views: 4 कविता कालिदास! सच-सच बतलानाइन्दुमती के मृत्युशोक सेअज रोया या तुम रोये थे?कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख सेनिकली हुई महाज्वाला मेंघृत-मिश्रित सूखी समिधा-समकामदेव जब भस्म हो…

placeholder

बादल को घिरते देखा है – नागार्जुन

Post Views: 3 अमल धवल गिरि के शिखरों पर,बादल को घिरते देखा है।छोटे-छोटे मोती जैसेउसके शीतल तुहिन कणों को,मानसरोवर के उन स्वर्णिमकमलों पर गिरते देखा है,बादल को घिरते देखा है।…

placeholder

अकाल और उसके बाद – नागार्जुन

Post Views: 6 कविता कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदासकई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पासकई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्तकई दिनों तक चूहों…

placeholder

जागो फिर एक बार – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 7 कविता जागो फिर एक बार!प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हेंअरुण-पंख तरुण-किरणखड़ी खोलती है द्वार-जागो फिर एक बार! आँखे अलियों-सीकिस मधु की गलियों में फँसी,बन्द कर पाँखेंपी…

placeholder

राम की शक्ति पूजा – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 8 कविता रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमररह गया राम-रावण का अपराजेय समरआज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,प्रतिपल – परिवर्तित – व्यूह – भेद…