Tag Archives: poem

” झुकना मत “

” झुकना मत “ जैसे ही डाक्टर ने कहा झुकना मत। अब और झुकने की गुंजाइश नही… सुनते ही उसे.. हँसी और रोना , एक साथ आ गया। ज़िंदगी में पहली बार वह किसी के मुँह से सुन रही थी ये शब्द …..।। बचपन से ही वह घर के बड़े, बूढ़ों माता-पिता, चाची, ताई, फूफी,मौसी.. अड़ोस पड़ोस, अलाने-फलाने, और समाज

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डा. सुभाष सैनी – तरसा होगा वो जि़ंदगी के लिए

ग़ज़ल तरसा होगा वो जि़ंदगी के लिए जिस ने सोचा है खुदकुशी के लिए दुश्मनी क्यों किसी से की जाए जि़ंंदगी तो है दोस्ती के लिए देखकर कत्लो-खून  के मंज़र हाथ उठते हैं बंदगी के लिए आज के दौर में हि$फाजत से जीना मुश्किल है, हर किसी के लिए जिसने तामीर की है महलों की वो तरसता है झोपड़ी के

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हरभजन सिंंह रेणु – सीढ़ी

कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी है जो नहीं नकारती अपना धर्म-कर्म वह फिर सेवा के लिए हाजिर होती है यह अलग बात है कहीं ‘सीढ़ी’ मैं हूं कहीं ‘सीढ़ी’ तुम हो कहीं ‘वह’ है और

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हरभजन सिंंह रेणु- ठीक कहा तुमने

कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं रचते-गाते मंत्र जपते पढ़ते हैं, बंद कमरों में छिपकर शब्दों के हथियार घड़ते हैं, सिद्धांतों के घोड़ों पर सवार स्वयं से लड़ते स्वंय ही जीतते-हारते और इस तरह सच्ची-झूठी लड़ाई

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चिड़िया – बी मदन मोहन

बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन में बिखरे दानों को चीं-चीं करते खा जाते शैतानी करते मनचाही मां के पीछे लग जाते पंक्ति बांध के चलते, जैसे रेल का इंजन छुक-छुक-छुक। तिनका कभी दबाए मुंह में

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प्यार का पैगाम – महेंद्र  सिंह ‘फकीर’

गीत धरती पर फैला दो, ये प्यार का पैगाम लव तो लव है इसमें, जेहाद का क्या काम ऐ जवानों करो बगावत इस माहौल के खिलाफ मानवता के दुश्मनों को करना कभी मत माफ भगत सिंह ने पिया था, पी लो वो ही जाम छुरी लहराने वाले क्यूं पा रहे सब मान फूल खिलाने वाले क्यूं झेल रहे अपमान दीप

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तीन मंत्र – भूप सिंह ‘भारती’

कविता एक रात सपने में मेरे, ‘बाबा साहेब’ आये। दासता से मुक्ति के, मंत्र तीन बताये। पहला मंत्र बड़ा सरल, शिक्षा की तुम करो पहल, शिक्षित बन हर बाधा को, आसानी से दोगे कुचल। अछूत नहीं, अभिषेक बनो, बुरे नहीं, तुम नेक बनो, बिखरा-2 है दलित वर्ग, दूजा मंत्र तुम एक बनो। अंतिम मंत्र रखना याद, संघर्ष करो छोड़ो फरियाद,

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 क्या यही सभ्यता है?- सिद्दीक़ अहमद मेव

कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही सभ्यता है? अनाथ होता बचपन माँँ-बाप का छिनता साया, चीखती हुई इनसानियत, क्या यही सभ्यता है? लहुलुहान होता बचपन, तड़पते हुए मासूम जिस्म, टूटती हुई निर्दोष सांसें, क्या यही सभ्यता

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रास्सा – अनुराधा बेनीवाल

कविता कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी माँ-बाबू तेरा हेज चहिये। दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़े का सारा हिसाब जोड़ ले। एक-एक किस्त मैं आप पुगा दूंगी, तू बोझ मन्ने एकबे कहणा छोड़ दे। मेरे पैदा होए पे आह ना भरिये, थाली स्टील की दोनुआं

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वसीयत – संत राम उदासी

कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस बूर सरकंडे का आहों की आंच काफी तीली भी न जलाना एकबारगी ही जलकर मैं न चाहूं राख़ होना जब -जब ढलेगा सूरज कण -कण मेरा जलाना. घेरे में कैद

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