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कबीर – कहां से आया कहां जाओगे

साखी – अलख1 इलाही2 एक है, नाम धराया दोय। कहे कबीर दो नाम सुनी, भरम3 पड़ो मति कोय।।टेक कहां से आया कहां जाओगे, खबर करो अपने तन की। सतगुरु मिले तो भेद बतावें, खुल जाए अंतर घट की।। चरण – हिन्दू मुसलिम दोनों भुलाने, खटपट माय रिया4 अटकी5। जोगी जंगम शेख सन्यासी, लालच माय रिया भटकी।। काजी बैठा कुरान बांचे,

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कबीर -पंडित तुम कैसे उत्तम कहाये

साखी – पंडित और मशालची1, दोनों को सूझे नाहि। औरन को करे चांदनी, आप अंधेरा मांई।।टेक पंडित तुम कैसे उत्तम कहाये। चरण – एक जाइनि2 से चार बरन3 भे, हाड़ मास जीव गूदा। सुत परि दूजे नाम धराये, वाको करम न छूटा।। कन्या जाति  जाति की बेचत6 , कौने जाति कहाये। आप कन्या बेचन लागे, भारी दाम चढ़ाय।। जहं लगि

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कबीर – अमल करे सो पाई

साखी – कहंता1 तो बहुत मिला, गहंता2 मिला न कोय। सो कहंता बहि जान दे, जो न गहंता होय।।टेक अमल करे सो पाई रे साधो भाई अमल करे सो पाई। जब तक अमल नशा नहीं करता, तब लग मजा न आई।। चरण – आन्दो2 आप लिए कर दीपक, कर परकास दिखाई। औरन आगे करे चांदनी, आप अंधेरा मांई।। आन्दो हाथ

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कबीर – म्हारो हीरो हेराणो कचरा में

साखी – पूरब दिशा हरी को बासा, पश्चिम अल्लह मुकामा। दिल में खोजि दिलहि मा खोजे, इहै करीमा रामा।।टेक – म्हारो हीरो हेराणो कचरा में, पांच पचीस का झगड़न में। चरण – कोई पूरब कोई पश्चिम ढूंढे हो। कोई पानी कोई पथरों में।। कोई तीरथ कोई बरत करत हो। कोई माला की जपरन में।। सुनीजन मुनीजन पीर औल्या हो। भूली

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कबीर – नाम से मिल्या ना कोई

साखी – हंसो का एक देश है, जात नहीं वहां कोय। कागा करतब ना तज1 सके, तो हंस कहां से होय।।टेक नाम से मिल्या न कोई रे साधो भाई नाम से मिल्या न कोई।। चरण – ज्ञानी मरग्या ज्ञान भरोसे, सकल भरमणा2 के मांई। दानी मरग्या दान भरोसे, कोड़ा3 लक्ष्मी खोई।। ध्यानी मरग्या ध्यान भरोसे, उल्टी पवन चड़ाई। तपसी मरग्या

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कबीर – पंडित छाण पियो जल पाणी

साखी – बैस्नों भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक। छापा तिलक बनाई करि, दुविधा लोक अनेक।। टेक – पंडित छाण पियो जल पाणी, तेरी काया कहां बिटलाणी1। चरण – वही माटी की गागर होती, सौ भर के मैं आई। सौ मिट्टी के हम तुम होते, छूती कहां लिपटाणी2।। न्हाय धोय के चौका दीना, बहुत करी उजलाई। उड़ मक्खी भोजन

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कबीर- तन काया का मन्दिर

साखी – मन मंदिर दिल द्वारखा, काया काशी जान। दस द्वारे का पिंजरा, याहि2 में ज्योत पहचान।। टेक तन काया का मंदिर साधु भाई, काया राम का मंदिर। इना मंदिर की शोभा पियारी, शोभा अजब है सुंदर।। चरण – पांच तीन मिल बना है मंदिर, कारीगर घड़ा-घड़ंतर। नौ दर3 खुल्ले दसवां बंद कर, कुदरत कला कलन्दर।। इना मंदिर में उन्मुख4

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कबीर – पंडित की धेनु दूध नहीं देती

साखी – पाथर पूजत हरि मिले, तो मैं पूजु पहाड़। वा से तो चाकी भली, पीस खाये संसार।।टेक धातु की धेनु दूध नही देती रे बीरा म्हारा, धातु की धेनु दूध नहीं देती। चरण – मंदिर में मुर्ति पदराई2, मुख से अन्न नहीं खाती रे। उको पुजारी वस्त्रा नी पेनावे, तो नांगी को नांगी बैठी रेती रे।। नाग पंचमी आवे

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कबीर – जोगी मन नी रंगाया

साखी – सिद्ध भया तो क्या भया, चहु दिस1 फूटी बास2। अंदर वाके  बीज है, फिर उगन की आस3। टेक जोगी मन नी रंगाया, रंगाया कपड़ा। पाणी में न्हाई-न्हाई पूजा फतरा4, तने मन नी रंगाया चरण – जाई जंगल जोगी धुणी लगाई हो। राख लगाई ने होया गदड़ा5।। जाई जंगल जोगी आसन लगाया। डाडी रखाई ने होया बकरा।। मुंड मुंडाई जोगी,

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कबीर- कोई सफा न देखा दिल का

संगत  साधु की, नित2 प्रीत कजे जाय। दुर्मति दूर बहावसि3, देखी सूरत जगाय।।टेक – कोई सफा न देखा दिल काचरण – बिल्ली देखी बगला देखा, सर्प जो देखा बिल का। ऊपर-ऊपर सुंदर लागे, भीतर गोला मल4 का।। काजी देखा मौला देखा, पंडित देखा छल का। औरन5 को बैकुंठ बताये, आप नरक में सरका6।। पढ़े लिखे नहीं, गुरुमंत्रा को, भरा गुमान

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