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गैस गुबारा – बी. मदन मोहन

बाल कविता मैं हूं गैस गुबारा भैया ऊंची मेरी उड़ान नदियां-नाले-पर्वत घूमूं फिर भी नहीं थकान बस्ती-जंगल बाग-बगीचे या हो खेत-खलिहान रुकता नहीं कहीं भी पलभर देखूं सकल जहान उड़ते-उड़ते गया हिमाचल देखा एक स्कूल नीचे था एक झरना बहता, महक रहे थे फूल ऊंची-नीची घाटी थी और मौसम था प्रतिकूल फिर भी पुस्तक लिए हाथ में बच्चे थे मशगूल

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