Tag: हिंदी

हिन्दी दुर्दशा- प्रो. सुभाष चन्द्र

भाषाओं में श्रेष्ठता के दावे नहीं चलते, जिस भाषा जो अभिव्यक्ति करता है उसके लिए वही भाषा महान होती है। दूसरी भाषाओं की कद्र करके ही हम अपनी भाषा के लिए सम्मान पा सकते हैं। भाषाओं में ऐसी संकीर्णताएं नहीं होती, ऐसी कोई भाषा नहीं जिसने दूसरी भाषाओं से शब्द न लिए हों। एक जगह से शब्द दूसरी जगह तक यात्रा करते हैं। जिस भाषा में ग्रहणशीलता को ग्रहण लग जाता है वह भाषा जल्दी ही मृत भी हो जाती है। (लेख से) … Continue readingहिन्दी दुर्दशा- प्रो. सुभाष चन्द्र

महर्षि दयानंद सरस्वती : हिंदी के प्रथम सेनापति – प्रो. अमरनाथ

Post Views: 57 आर्यसमाज के अवदान को आज लोग भूल चुके हैं किन्तु एक समय में हिन्दू समाज को कुरीतियों, कुप्रथाओं, अंधविश्वासों और कुसंस्कारों से मुक्त करने में आर्यसमाज की

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गुणाकर मुले : विज्ञान को हिन्दी में सुलभ कराने वाले अप्रतिम योद्धा – प्रो. अमरनाथ

Post Views: 75 सरल हिन्दी में विज्ञान को जन -जन तक पहुँचाने में मराठी भाषी गुणाकर मुले ( 3.1.1935) का योगदान अप्रतिम है. महाराष्ट्र के अमरावती जिले में जन्म लेने

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तीन कविताएं- दयाल चंद जास्ट

Post Views: 23 1. कितना दुखद होता है वह लम्हा जब औरत की होती है खरीद-फरोख्त होती है जबरन शादी   होता है उसके साथ दुष्कर्म और पुलिस लेती रहती है सपना कि गली-गली और कूचे-कूचे सब सुरक्षित हैं।   कितना दुखद होता है वह लम्हा जब कोई बेरोजगार रह जाता है नौकरी लगने से होती रहती है प्रतिभाओं के साथ ज्यादती वह रोता है अपनी डिग्रियों को देखकर और अफसर खेलते हैं नोटों में प्रचार कि साफ-सुथरी भर्ती हुई है।   कितना दुखद होता है वह लम्हा जब हार जाता है सच्चा इंसान बिक जाते हैं गवाह और बिक जाते हैं जज साहब वह उम्र-भर सडता है सलाखों के पीछे कि न्याय भटक जाता है पथ से।   कितना दुखद होता है वह लम्हा जब अन्न-भंडार भरे होते हैं मंडियों में और भूख से मर जाए कोई बच्चा होता रहता है आयात-निर्यात

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हिंदी भाषा चुनौतियां और समाधान – मोहम्मद इरफान मलिक

Post Views: 6,273 मोहम्मद इरफान मलिक अरबी विभाग पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला यह लेख हरियाणा सृजन उत्सव 2019 में पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला, अरबी विभाग के मोहम्मद इरफान मलिक ने पेश किया

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मंहगाई डायन खाए जात है -डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 382 मंहगाई की प्राकृतिक आपदा या संकट नहीं है, बल्कि इसके पीछे निहित स्वार्थ हैं। वे स्वार्थ हैं अधिक से अधिक लाभ कमाने के। पूंजीवादी व्यवस्था लाभ पर

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मजदूर बनाम राष्ट्र -सुरेश बरनवाल

Post Views: 795 कविता यह भी तो एक युद्ध है कि एक मजदूर दिन भर की दिहाड़ी के बाद आधा राशन लिए घर लौटता है। उसके बच्चे हर रोज युद्धभूमि

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गोदान के होरी का समसामयिक संदर्भ – आदित्य आंगिरस

Post Views: 1,136 आलोचना गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और

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हरियाणा में भाषायी विविधता – सुधीर शर्मा

समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदली और ‘बांगरू’ भाषा के लोक नाटक (सांग), रागनी, कथाएं, गाथाएं, किस्से, कहानियां, लोक गीत, फिल्में, हास्य-व्यंग्य इतने प्रचारित-प्रसारित हुए कि एक सीमित क्षेत्र की भाषा ही हरियाणवी मानी जाने लगी। … Continue readingहरियाणा में भाषायी विविधता – सुधीर शर्मा