Tag Archives: हिंदी

हिंदी भाषा चुनौतियां और समाधान – मोहम्मद इरफान मलिक

मोहम्मद इरफान मलिक अरबी विभाग पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला यह लेख हरियाणा सृजन उत्सव 2019 में पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला, अरबी विभाग के मोहम्मद इरफान मलिक ने पेश किया था। प्रस्तुत है उसका हिंदी अनुवाद। हिंदी भारतीय सभ्यता, संस्कृति और समाज की भाषा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इक्कीसवीं सदी में कोई भी भाषा ऐसी नहीं है, जिसको

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डा. सुभाष चंद्र – मंहगाई डायन खाए जात है

मंहगाई की प्राकृतिक आपदा या संकट नहीं है, बल्कि इसके पीछे निहित स्वार्थ हैं। वे स्वार्थ हैं अधिक से अधिक लाभ कमाने के। पूंजीवादी व्यवस्था लाभ पर टिकी होती है। लाभ कमाने के दो ही तरीके अभी तक पूंजीवाद कर पाया है। एक तो श्रम का कम हिस्सा देकर तथा दूसरा अपने उत्पाद के बदले में अधिक लेकर। जब बाजार

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सुरेश बरनवाल – मजदूर बनाम राष्ट्र

कविता यह भी तो एक युद्ध है कि एक मजदूर दिन भर की दिहाड़ी के बाद आधा राशन लिए घर लौटता है। उसके बच्चे हर रोज युद्धभूमि में उतरते हैं हसरतों को मारते हैं। यह ऐसा युद्ध है जिसमें दो राष्ट्र तो नहीं लड़ते पर एक राष्ट्र फिर भी हार जाता है। स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016)

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गोदान के होरी का समसामयिक संदर्भ – आदित्य आंगिरस

आलोचना गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता और भारतपरायणता के साथ स्वार्थपरता और बैठकबाजी, उसकी बेबसी और निरीहता का जीता जागता चित्र उपस्थित किया गया है जिसमें उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसी को

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हरियाणा में पंजाबी भाषा व साहित्य की वस्तुस्थिति

                अक्सर हरियाणा में पंजाबी संस्था या विभाग को छोड़ कर और जितनी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा जितनी भी भाषण व लेखन प्रतियोगिताएं होती हैं, उसमें अभिव्यक्ति का माध्यम सिर्फ हिन्दी या अंग्रेजी भाषा ही होता है, परन्तु पंजाबी भाषा के प्रति यह रवैया नकारात्मक होता है। जिसके कारण पंजाबी भाषी विद्यार्थी इस तरह की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से वंचित रह जाते हैं।

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हरियाणा में भाषायी विविधता

समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदली और ‘बांगरू’ भाषा के लोक नाटक (सांग), रागनी, कथाएं, गाथाएं, किस्से, कहानियां, लोक गीत, फिल्में, हास्य-व्यंग्य इतने प्रचारित-प्रसारित हुए कि एक सीमित क्षेत्र की भाषा ही हरियाणवी मानी जाने लगी। हरियाणा के प्रतिष्ठित भाषाविद् डा. बलदेव सिंह का मत है कि ‘‘यहां जिस हरियाणी की बात की जा रही है, वह सारे हरियाणा की बोली नहीं है, अपितु रोहतक और सोनीपत की बांगरू है। इसके अतिरिक्त हरियाणा के में ब्रज, मेवाती, अहीरवाटी, बागड़ी, कुरुक्षेत्र-करनाल की कौरवी आदि कई बोलियां हैं।’’

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