Tag Archives: हरियाणा उर्दू शायर

मुनाजात-ए-बेवा

अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती   मुनाजात-ए-बेवा (1884) ए सब से अव्वल1 और आखिर2 जहाँ-तहाँ हाजि़र और नाजि़र3 ए सब दानाओं से दाना4 सारे तवानाओं से तवाना5 ए बाला हर बाला6 तर से चाँद से सूरज से अम्बर से ए समझे बूझे बिन सूझे जाने पहचाने बिन बूझे सब से अनोखे सब से निराले आँख से ओझल दिल के उजाले ए

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हुब्बे वतन

अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती की पुण्य तिथि के अवसर पर। हाली का जन्म हुआ था सन् 1837 में और मृत्यु हुई 31 दिसंबर 1914 में। हाली की एक कविता है ‘हुब्बे वतन’ यानी देश-प्रेम।  हरियाणा सृजन उत्सव में जन नाट्य मंच कुरुक्षेत्र ने  25 फरवरी 2017 को इसके एक अंश को प्रस्तुत किया था।  अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती   हुब्बे

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बेटियों की निस्बत

अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती   ज़ाहलियत के ज़माने में ये थी रस्मे अरब के किसी घर में अगर होती थी पैदा दुख़्तर1 संग दिल2 बाप उसे गोद से लेकर माँ की गाड़ देता था ज़मीं में कहीं जि़न्दा जाकर रस्म अब भी यही दुनिया में है जारी लेकिन जो के अन्धे हैं हिय्ये के नही कुछ उनको ख़बर लोग बेटी

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रात भर लोग अंधेरे की बलि चढ़ते हैं

ओमसिंह अशफाक  आबिद आलमी (4-6-1933—9-2-1994) पिछले दिनों अम्बाला में तरक्की पसंद तहरीक में ‘फिकोएहसास के शायर’ जनाब आबिद आलमी हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गए। उनका मूल नाम रामनाथ चसवाल था, परन्तु शायरी की दुनिया में वे ‘आबिद आलमी’ के नाम से मशहूर हुए। उनका जन्म 4 जून 1933 को जिला रावलपिंडी की गूजनखान तहसील के गांव ददवाल में हुआ

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बलबीर सिंह राठी – ऐसे अपनी दुआ क़ुबूल हुई

 ग़ज़ल ऐसे अपनी दुआ क़ुबूल हुई, राह तक मिल सकी न मंजि़ल की, कारवाँ से बिछडऩे वालों को, उन की मंजि़ल कभी नहीं मिलती। खो गई नफ़रतों के सहरा1 में, प्यार की वो नदी जो सूख गई। राह बचकर निकल गई हमसे, वो तो मंजि़ल वहीं पे आ पहुंची। मेरे सर पर तना रहा सहरा, ये हवाओं की कोई साजि़श

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बलबीर सिंह राठी – ये अलग बात बच गई कश्ती

 ग़ज़ल   ये अलग बात बच गई कश्ती, वरना साजि़श भंवर ने ख़ूब रची। कह गई कुछ वो बोलती आँखें, चौंक उट्ठी किसी की ख़ामोशी। हम तो लड़ते रहे दरिन्दों से, तुम ने उन से भी दोस्ती कर ली। दिन भी होगा किसी के आँगन में, अपने चारों तरफ तो रात रही। यूँ भी अक्सर हुआ है मेरे घर, रात,

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बलबीर सिंह राठी – पहले कोई ज़ुबाँ तलाश करूँ

 ग़ज़ल पहले कोई ज़ुबाँ तलाश करूँ, फिर नई शोखियाँ1 तलाश करूँ। अपने ख्वाबों की वुसअतों2 के लिए, मैं नये आसमां तलाश करूँ। मंजि़लों की तलाश में निकलूँ, मुस्तकिल3 इम्तिहाँ तलाश करूँ। मेरी आवारगी ये माँग करे, मैं नई दूरियाँ तलाश करूँ। फिर मसल्सल फ़रेब खाने को, तुझ सा फिर मेहरबां तलाश करूँ। हर तरफ नफ़रतों के सहरा हैं, प्यार मैं

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बलबीर सिंह राठी – कौन बस्ती में मोजिज़ा गर है

 ग़ज़ल कौन बस्ती में मोजिज़ा गर है, हौंसला किस में मुझ से बढ़ कर है। चैन    से   बैठने   नहीं   देता, मुझ में बिफरा हुआ समन्दर है। लुट रहे हैं मिरे नफ़ीस ख्याल, कोई रहज़न भी मेरे अन्दर है। आदमी से हैं लोग ख़ौफ़ ज़दा, वहशियों से किसी को क्या डर है। ज़ुल्मों-इन्साफ़ की लड़ाई में, मेरा दुश्मन तो हर

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बलबीर सिंह राठी – कौन कहता है कि तुझको हर खुशी मिल जाएगी

 ग़ज़ल कौन कहता है कि तुझको हर खुशी मिल जाएगी, हां मगर इस राह में मंजि़ल नई मिल जाएगी। अपनी राहों में अंधेरा तो यक़ीनन है मगर, हम युँही चलते रहे तो रोशनी मिल जाएगी। इस क़दर सीधा है, ये रिश्तों का सारा सिलसिला, मेरे अफ़साने में तेरी बात भी मिल जाएगी। यूँ अंधेरी बंद गलियों में खड़े हो किस

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बलबीर सिंह राठी – जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी

 ग़ज़ल जिनकी नज़रों में थे रास्ते और भी, जाने क्यों वो भटकते गये और भी। मैं ही वाक़िफ़ था राहों के हर मोड़ से, मैं जिधर भी चला चल दिये और भी। जो कहा तुम ने वो हर्फ़े आख़िर न था, थे हक़ीक़त के कुछ सिलसिले और भी। अक्स टेढ़े लगे उसमें तुम को मगर, आइने के थे कुछ ज़ाविये1

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