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गहराई तक जावण म्हं बखत तो लागै सै -रिसाल जांगड़ा

Post Views: 136 हरियाणवी ग़ज़ल रिसाल जांगड़ा   गहराई तक जावण म्हं बखत तो लागै सै। सच्चाई उप्पर ल्यावण म्हं बखत तो लागै से।   करैग जादां तावल जे उलझ…

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विश्व की समस्त भाषाओं के बारे में सार्वभौमिक सत्य – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 242 प्रोफेसर सुभाष चंद्र, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र जब लोग इकट्ठे होते हैं तो बात ही करते हैं। जब वे खेलते हैं, प्यार करते हैं। हम भाषा की दुनिया…

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धर्मेन्द्र कंवारी

धर्मेन्द्र कंवारी की हरियाणवी कविता
मोल की लुगाई
रामफळ गेल या कै मुसीबत आई
किल्ले तीन अर घरां चार भाई
मां खाट म्ह पड़ी रोज सिसकै
मन्नै बहू ल्यादौ, मन्नै आग्गा दिक्खै

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हरियाणा में भाषायी विविधता – सुधीर शर्मा

समय के साथ-साथ परिस्थितियां बदली और ‘बांगरू’ भाषा के लोक नाटक (सांग), रागनी, कथाएं, गाथाएं, किस्से, कहानियां, लोक गीत, फिल्में, हास्य-व्यंग्य इतने प्रचारित-प्रसारित हुए कि एक सीमित क्षेत्र की भाषा ही हरियाणवी मानी जाने लगी।