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दिन – संगीता बैनीवाल

Post Views: 125  बाजरे की सीट्टियां पै खेत की मचाण पै चिड्ड़ियां की लुक-मिच्चणी संग खेल्या अर छुपग्या दिन। गोबर तैं लीपे आंगण म्ह हौळे हौळे आया दिन। टाबर ज्यूं…

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दीया

Post Views: 234 संगीता बैनीवाल सारे दीखैं तोळा-मासा मैं तो बस रत्ती भर सूं माटी म्ह मिल ज्यां इक दिन माटी तैं फेर बण ज्यां सूं जितना नेह-तेल भरोगे उतनी…

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ओबरा -विपिन चौधरी

Post Views: 151 हरियाणवी कविता जद ताती-ताती लू चालैं नासां तैं चाली नकसीर ओबरे म्हं जा शरण लेंदे सिरहानै धरा कोरा घड़ा ल्हासी-राबड़ी पी कीं काळजे म्हं पड़दी ठंड एक…

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मेरा सादा गाम – विपिन चौधरी

Post Views: 91  हरियाणवी कविता म्हारी बुग्गी गाड्डी के पहिये लोहे के सैं जमां चपटे बिना हवा के जूए कै सेतीं जुड़ रहे सैं मण हामी इसे म्हं बैठ उरै…

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सरपंची – जसबीर लाठरों

Post Views: 89 हरियाणवी कविता गाम मां सरपंची के लेक्शन का, घणा इ रोळा ओर्या था, जोणसा बी लेक्शन मां खड्या था, ओइयो बोळा ओर्या था, भरतु शराबी देसी दारू…

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संघर्ष कथा – सहीराम

Post Views: 284 आंखिन देखी मैं कहता हूं, सुनी सुनायी झूठ कहाय। गाम राम की कथा सुनाऊं, पंचों सुनियो ध्यान लगाय। हल और बल कुदाली कस्सी, धान बाजरा फसल गिनाय।…

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गांव की छोरियां -विपिन चौधरी

Post Views: 114 हरियाणवी कविता गोबर चुगणे नै गांव की छोरियां खेल समझैं तो बड़ी बात कोनी ऊपर ताईं गोबर भरा तांसळा खेल-खेल म्हं भर लिया काम का काम भी…