जाट कहवै, सुण जाटणी – प्रदीप नील वशिष्ठ

एक बात ने कई सालों से मुझे परेशान कर रखा था। और वह शर्म की बात यह कि अपने  हरियाणा में हरियाणवी बोलने वाले को नाक-भौं चढ़ा कर इस नजऱ…

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वर्तमान समय की दुरभिसंधि की करुण कथा – जाट कहवै , सुण जाटनी- राजेन्द्र गौतम

ग्लोकल और लोकल की फ्रेज इस उपन्यास के साथ विशेष रूप से जुडी है क्योंकि इसमें चित्रित समस्या का आकार अखिल भारतीय है पर उसको जिस भाषिक और शैल्पिक कलेवर…