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स्त्री-चिंतन मार्फत ‘गूंगे इतिहासों की सरहदों पर -अंकित नरवाल

दुनिया की आधी आबादी होने के बावजूद स्त्रियों की अपनी स्वतंत्रता, समानता और सत्ता के लिए तथाकथित लैंगिक नियमों, संस्कृतियों और पितृसत्तावादी मानदण्डों से जद्दोजहद जारी है। शताब्दियों से विवाह, विज्ञापन, सौंदर्य-प्रसाधन और सामंती सारणियों के तमाम प्रयोजन उसे माल में तब्दील कर उसकी खरीद-फरोत पर आमादा हैं। स्त्री-जीवन की इसी जद्दोजहद के भावबोध से भरी सुबोध शुक्ल की अनूदित पुस्तक ‘गूंगे इतिहासों की सरहदों तक’ नारी-जीवन के पाश्चात्यी दृष्टिकोण को सामने लाती है, जिससे मुख्यतः अमेरिका और यूरोप का बीसवीं शताब्दी का स्त्रीवादी-चिंतन हमारे सामने आता है। बेट्टी फ्रीडन, केट मिलेट, शुलामिथ फायरस्टोन, एंड्रिया डुआर्किन, नवल अल सादवी, ग्लोरिया जां वॉटकिंस ‘बेल हुक्स’, नाओमी वुल्फ और फ्रिस्टीना हॉफ सॉमर्स नामक आठ स्त्री-चिंतकों की प्रमुख पुस्तकों से कुछ चुने हुए लेख इस पुस्तक में शामिल किए गए हैं, जो स्त्री-जीवन के संघर्षों की ओर हमारा ध्यान ले जाते हैं।