placeholder

जागो फिर एक बार – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 27 कविता जागो फिर एक बार!प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हेंअरुण-पंख तरुण-किरणखड़ी खोलती है द्वार-जागो फिर एक बार! आँखे अलियों-सीकिस मधु की गलियों में फँसी,बन्द कर पाँखेंपी…

placeholder

राम की शक्ति पूजा – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 144 कविता रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमररह गया राम-रावण का अपराजेय समरआज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,प्रतिपल – परिवर्तित – व्यूह – भेद…

placeholder

बादल राग – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 69 कविता झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर।राग अमर! अम्बर में भर निज रोर! झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में,घर, मरु, तरु-मर्मर, सागर में,सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में,मन में, विजन-गहन-कानन में,आनन-आनन में,…

placeholder

सरोज स्मृति – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 76 कविता सरोज स्मृति ऊनविंश पर जो प्रथम चरणतेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;तनये, ली कर दृक्पात तरुणजनक से जन्म की विदा अरुण!गीते मेरी, तज रूप-नामवर लिया अमर शाश्वत विरामपूरे कर…

placeholder

भिक्षुक – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 12 कविता भिक्षुक वह आता–दो टूक कलेजे को करता, पछतातापथ पर आता। पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,चल रहा लकुटिया टेक,मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने कोमुँह…

placeholder

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 14 कविता बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!पूछेगा सारा गाँव, बंधु! यह घाट वही जिस पर हँसकर,वह कभी नहाती थी धँसकर,आँखें रह जाती थीं फँसकर,कँपते थे दोनों पाँव…

placeholder

कुकुरमुत्ता – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 10 कविता एक थे नव्वाब,फ़ारस से मंगाए थे गुलाब।बड़ी बाड़ी में लगाएदेशी पौधे भी उगाएरखे माली, कई नौकरगजनवी का बाग मनहरलग रहा था।एक सपना जग रहा थासांस पर…

placeholder

तोड़ती पत्थर – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 9 वह तोड़ती पत्थर;देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादारपेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;श्याम तन, भर बंधा यौवन,नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,गुरु…

placeholder

राजे ने अपनी रखवाली की – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

Post Views: 91 कविता राजे ने अपनी रखवाली की;किला बनाकर रहा;बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं ।चापलूस कितने सामन्त आए ।मतलब की लकड़ी पकड़े हुए ।कितने ब्राह्मण आएपोथियों में जनता को बाँधे हुए…