Tag Archives: सुभाष चंद्र

सावित्रीबाई फुले : जीवन जिस पर अमल किया जाना चाहिए

7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन 09 Jan 2018 7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया I इस कार्यक्रम

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डा. सुभाष चंद्र – मंहगाई डायन खाए जात है

मंहगाई की प्राकृतिक आपदा या संकट नहीं है, बल्कि इसके पीछे निहित स्वार्थ हैं। वे स्वार्थ हैं अधिक से अधिक लाभ कमाने के। पूंजीवादी व्यवस्था लाभ पर टिकी होती है। लाभ कमाने के दो ही तरीके अभी तक पूंजीवाद कर पाया है। एक तो श्रम का कम हिस्सा देकर तथा दूसरा अपने उत्पाद के बदले में अधिक लेकर। जब बाजार

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सम्पादकीय – इनआमे-हरियाना

 संपादकीय इनआमे-हरियाना हमें जिस रोज से हासिल हुआ इनआमे-हरियाना। बनारस की सुबह से खुशनुमा है शामे-हरियाना। न क्यों शादाब हो हर फ़र्दे-खासो आमे हरियाना। तयूरे-बाग़ भी लेते हैं जबकि नामे-हरियाना। नसीमे-रूह परवर चल पड़ी है सहने-गुलशन में, न हो क्यों बुलबुलें शैदा असीरे-दामे-हरियाना। फरोग़ इतना कहां हासिल हुआ है अहले-आलम को, कहां कम है अरूजे-आस्मां से बामे-हरियाना। अयां है इसके

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नफरत की राजनीतिक बहस और सांप्रदायिक सद्भाव व दोस्ती की दास्तान

सुभाष चंद्र  ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं                               – फ़ैज अहमद फ़ैज लंबे संघर्ष के बाद भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिली, लेकिन औपनिवेशक शासक देश को दो टुकड़ों में विभाजित करके एक

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बेखौफ सोच – सुभाष चंद्र (रविंद्रनाथ टैगोर की चित्त जहां भय शून्य का हरियाणवी अनुवाद)

हरियाणवी अनुवाद जडै सोच हो बेखौफ, स्वाभिमान हो जड़ै, जडैं ज्ञान हो आजाद, घर-आंगण में संकीर्ण भीत ना खड़ै जड़ै ना बंडै धरती हररोज छोट-छोटे टुकड़्यां टुकड़्यां म्हं    जड़ै काळजे की तळी तै लिकडैं, साच्चे साच्चे बोल चार-चफैरे फूटैं सोत्ते करमां की नदी के बेरोकटोक बहै विचारां की नदी  जड़ै टुच्चे-स्वार्थी बुहार का बाळू रेत विचारां की नदी नै डकार

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दो पंछी – रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘दुई पाखी’ का हरियाणावी अनुवाद सुभाष चंद्र)

(रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘दुई पाखी’ का हरियाणावी अनुवाद) पिंजरे का पंछी था सोने के पिंजरे में अर बण का पंछी था बण म्हं बेरा नी क्यूकर दोनूं मिलगे, पता नी के था ऊपर आळे के मन म्हं  बण का पंछी बोल्या, भाई पिंजरे के पंछी, चाल चाल्लें दोनों बण म्हं पिंजरे का पंछी बोल्या, बण के पंछी, आजा मौज

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रविन्द्रनाथ टैगोरः विराट भारतीय आत्मा

प्रोफेसर सुभाष चंद्र, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र रवीन्द्र नाथ मूलतः बंगला के कवि हैं, लेकिन वे भारत के और विश्व के कवि हैं। आधुनिक भारत के लिए बंगाल अनुकरणीय रहा है। समाज में परिवर्तन की लहर बंगाल से होकर पूरे देश में आई है। राजा राम मोहनराय के समय से ही यह शुरुआत हों गई थी। नवजागरण के सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों पर

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ये सिरफिरों की भीड़ है या संगठित गिरोह

पिछले दो महीनों में 30 से ज्यादा लोग भीड़ हिंसा का शिकार हो चुके हैं। यह किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि 14 राज्यों तक इसका विस्तार है। ये ‘बाहरी’ लोग करार देकर व उनसे सुरक्षा के डर में मारे गए हैं अथवा साम्प्रदायिक आग्रहों के कारण मारे गए हैं।

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