Tag Archives: सिरसा

तुर्कों की निरंकुशता के विरुद्ध-संघर्ष

बुद्ध प्रकाश 24 जून, 1206 को कुतबुद्दीन ऐबक दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठा और उत्तरी भारत के तुर्क राज्य की प्रतिष्ठापना की। मध्यवर्ती एशिया के धर्मांध तथा लड़ाकू तुर्क देश के स्वामी बन गए। परन्तु उनका शासन इस्लाम-शासन तो नाममात्र का ही था, वास्तव में यह एक तुर्क अभिजातवर्गीय शासन था। उन्होंने अपने शोषण तथा निरंकुशता द्वारा लोगों का खूब

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हरियाणा का इतिहास-अल्पतंत्रीय वर्ग का उत्थान

बुद्ध प्रकाश यौधेयों ने, जिनके विषय में पहले उल्लेख किया जा चुका है, ई, पू.  की प्रथम तथा द्वितीय शताब्दी के उत्तरार्ध में अपनी मुद्रा चला कर भारतीय इतिहास में ख्याति प्राप्त की। उन सिक्कों को उनके रूपांकनों के आधार पर अनेक वर्गों में बांटा जा सकता है। कुछ पर चक्र वृक्ष, कुछ पर ध्वज और सूर्य तथा कुछ पर

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रेलगाड़ी

सुरेश बरनवाल ज्यों ही रेलगाड़ी की सीटी की आवाज सुनाई दी, बूढ़ा जसवन्त मंजी से तेजी से उठा और लंगड़ाता सा घर के भीतर चला गया। भीतर जाते समय उसने एक बार कातर निगाहों से अपने पोते सुलतान की तरफ  देखा। सुलतान ने अपनी नजर नीची कर ली और सामने खड़े ग्राहक को सामान देने का बहाना करने लगा। जसवन्त

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ओ. पी. सुथार – वर्तमान कृषि संकट और किसान आन्दोलन

गतिविधियां सिरसा में अखिल भारतीय किसान सभा के 34 वे राष्ट्रीय सम्मेलन तैयारी के लिए स्वागत समिति के गठन के अवसर पर ‘युवक साहित्य सदन’ के सभागार में  ‘वर्तमान कृषि संकट और किसान आन्दोलन’ विषय पर सेमिनार किया गया। इसकी अध्यक्षता किसान सभा के जिला प्रधान सुरजीत सिंह, जसवन्त सिंह पटवारी,पूर्व सरपंच गुलजारी लाल ढाका व नछत्र सिंह पूर्व सरपंच

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तुम कबीर न बनना- हरभजन सिंंह रेणु

    कविता जब मेरे दोस्त मुझे कबीर बना रहे थे मैं प्यादों की ताकत से ऊंटों की शह मात बचा रहा था घोड़े दौड़ा रहा था तभी मेरे भीतर बैठा कबीर कह  रहा था तुम कबीर मत बनना। ये अक्षरों गोटियों का खेल त्याग और मेरे साथ ताणा बुन ध्यान दे घर का गुजारा चलाती लोई का कमाले को

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हरभजन सिंंह रेणु – प्रतिकर्म

कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की ईंट फेंकू तुम्हारी ही ओर। तुम जो अरसे से मेरे पैर की अंगुली को रोंद रहे हो अपने जूतों तले मेरे अंदर ठोक रहे हो कुछ अनघड़ा सा सभी एक

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हरभजन रेणु सिंह – कहा था न

कविता मैंने तुम्हें कहा था न मत कर कबीर-कबीर और अब शहर के बाहर खड़ा रह अकेला। अपने फुंके घर का देख तमाशा हक सच की आवाज लगाता पंजाबी से अनुवाद :  गीता ‘गीतांजलि’ स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -22

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हरभजन सिंंह रेणु – वैश्वीकरण

कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी नजर के सामने नाचते गाते कहोगे हम आजाद हैं सोच भी सकते हैं। पंजाबी से अनुवाद :  गीता ‘गीतांजलि’ स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -21

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हरभजन सिंंह रेणु – सीढ़ी

कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी है जो नहीं नकारती अपना धर्म-कर्म वह फिर सेवा के लिए हाजिर होती है यह अलग बात है कहीं ‘सीढ़ी’ मैं हूं कहीं ‘सीढ़ी’ तुम हो कहीं ‘वह’ है और

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हरभजन सिंंह रेणु – बनवास

कविता वनों की ओर जाना ही नहीं होता बनवास जब भी अकेलापन करता है उदास ख्यालों के कुरंग नाचते हैं चुप्पी देती है ताल उल्लू चीखते हैं बिच्छू डसते हैं नाग रेंगते हैं आस-पास हम अपने भीतर के जंगल में पलों में वर्षों का भोग लेते हैं बनवास। पंजाबी से अनुवाद : पूरन मुद्गल व मोहन सपरा स्रोतः सं. सुभाष

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