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भारतीय भाषाओं में छंद विधान- रामविलास शर्मा

हिंदी काव्य की नींव अवश्य गहरी और दृढ़ है, पर उसके ऊपर विद्यापति, जायसी, कबीर, सूर और तुलसी ने जो सुंदर भवन निर्मित किया, उसके निर्माण में सबसे बड़ी बाधा अपभ्रंश में साहित्य रचने की परंपरा थी । यदि विद्यापति इस परंपरा का अनुसरण करते चले जाते तो उनका युगांतकारी महत्त्व हिंदी काव्य की गहरी नींव के नीचे ही दबा रह जाता । (लेख से)

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पाँच कविताएँ- चन्द्रकांत देवताले

चन्द्रकांत देवताले हिंदी के उन कवियों में से हैं जिनकी कविता ने पिछली सदी और वर्तमान सदी को जोड़ा है। उनकी कविता में उनका अपना ‘मैं’ यानि कि ‘प्रथम पुरुष’ अंतर्दृष्टि के सन्दर्भ में विस्तार पाता है। मार्क्सवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सर्वविदित है। यहाँ जिन कविताओं का चयन किया गया है उनमें शुरूआती तीन कविताएँ तो भाषा के प्रति उनकी संजीदगी को प्रकट करती हैं, चौथी कविता एक तरह से उनकी जीवन दृष्टि को प्रस्तुत करती है तथा पांचवी कविता ‘नागझिरी’ लम्बी कविता है जोकि गाँव के भीतर धक्का मुक्की करके घुसते हुए शहर का बिम्बात्मक बयान है।

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मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

इस देश में हिन्दू हैं, मुसलमान हैं, स्पृश्य हैं, अस्पृश्य हैं, संस्कृत हैं, फारसी हैं- विरोधों और संघर्षों की विराट वाहिनी है; पर सबके ऊपर मनुष्य है- विरोधों को दिन रात याद करते रहने की अपेक्षा अपनी शक्ति का संबल लेकर उसकी सेवा में जुट जाना अच्छा है। जो भी भाषा आपके पास है, उससे बस मनुष्य को ऊपर उठाने का काम शुरू कर दीजिए। आपका उद्देश्य आपकी भाषा बना देगा।  (निबंध से)

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होने वाले महाकवि के लिए- शमशेर बहादुर सिंह

शमशेर बहादुर सिंह द्वारा लिखा गया यह लेख नए कवियों के लिए एक जरूरी दस्तावेज की तरह है। इस संक्षिप्त लेख में वह एक ओर आने वाले कवियों को गहन अध्ययन तथा अपने परिवेश की गूढ़ समझ पैदा करने की महत्वपूर्ण सलाह दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर आधुनिक कविता के लिए भाषा, शिल्प, कथ्य आदि के उचित सामंजस्य के महत्व को भी स्पष्ट कर रहे हैं।

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मेरे गांव से मेरे घर तक कोई रास्ता नहीं जाता- अष्टभुजा शुक्ल

बहुत मोटी-मोटी, बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर एम.फिल, डी.फिल, पी.डी.एफ. क्या-क्या होता है लेकिन कविता को आम जन जितनी गहराई से समझता है-शायद शिष्ट समाज उस तरह से जिंदगी के मुहावरे को, जिंदगी की संवेदना को और उस लोक जीवन से जो संवेदना निकलती है उसे नहीं समझता। (लेख से)

‘उजाले हर तरफ़ होंगे’ (मनजीत भोला) की समीक्षा- डॉ० दिनेश दधीचि

प्रस्तुत समीक्षा का पाठ डॉ. दिनेश दधिची द्वारा 03.12.2021 को हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय कुरुक्षेत्र एवं देस हरियाणा पत्रिका के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित “उजाले हर तरफ होंगे” ग़ज़ल संग्रह पर केन्द्रित समीक्षा गोष्ठी में किया गया था.

मनजीत भोला: हिंदी ग़ज़ल में एक नया नाम – योगेश शर्मा

प्रस्तुत समीक्षा का पाठ 03.12.2021 को हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय कुरुक्षेत्र एवं देस हरियाणा पत्रिका के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित “उजाले हर तरफ होंगे” ग़ज़ल संग्रह पर केन्द्रित समीक्षा गोष्ठी में किया गया था.

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गाँधी जी की राष्ट्रभाषा ‘हिन्दुस्तानी’ का क्या हुआ? – अमरनाथ

वैसे भी हिन्दुस्तानी कहने से जिस तरह व्यापक राष्ट्रीयता और सामाजिक समरता का बोध होता है उस तरह हिन्दी कहने से नहीं. जैसे पंजाबियों की पंजाबी, मराठियों की मराठी, बंगालियों की बंगाली, तमिलों की तमिल, गुजरातियों की गुजराती का बोध होता है उसी तरह हिन्दुस्तानी कहने से हिन्दुस्तानियों की हिन्दुस्तानी का बोध होता है. (लेख से)

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चिन्दी चिन्दी होती हिन्दी। हम क्या करें?- अमरनाथ

स्मिताओं की राजनीति करने वाले कौन लोग हैं ? कुछ गिने –चुने नेता, कुछ अभिनेता और कुछ स्वनामधन्य बोलियों के साहित्यकार। नेता जिन्हें स्थानीय जनता से वोट चाहिए। उन्हें पता होता है कि किस तरह अपनी भाषा और संस्कृति की भावनाओं में बहाकर गाँव की सीधी-सादी जनता का मूल्यवान वोट हासिल किया जा सकता है। (लेख से)

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तुलसी की लोकप्रियता का रहस्य- अमरनाथ

सारा अभियान अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध है और समता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना के लिए है.  उन्होंने एक आदर्श राज्य – रामराज की परिकल्पना की है जो हमारे युग के महानतम व्यक्ति गांधी का भी सपना बन गया. (लेख से)