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राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 : ठेंगे पर राजभाषा- अमरनाथ

शिक्षा को पूरी तरह निजी हाथों में सौंप देगी. शिक्षा इतनी मंहगी हो जाएगी कि ज्ञान और प्रतिष्ठित नौकरियां भी थोड़े से अमीर लोगों के हाथ में सिमटकर रह जाएंगी. अपने घरों में स्थानीय बोलियाँ बोलने वाले किसानों और मजदूरों के ग्रामीण बच्चे भला महानगरों के पाँच सितारा अंग्रेजी माध्यम वाले बच्चों का मुकाबला कैसे कर सकेंगे? (लेख से)

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पराई भाषा में पढ़ाई और गाँधी जी- अमरनाथ

गाँधी जी चाहते थे कि बुनियादी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सब कुछ मातृभाषा के माध्यम से हो. दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान ही उन्होंने समझ लिया था कि अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा हमारे भीतर औपनिवेशिक मानसिकता बढ़ाने की मुख्य जड़ है. ‘हिन्द स्वराज’ में भी उन्होंने लिखा कि, “करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है. (लेख से )

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कुर्सी के लिए कत्ल- गोपाल प्रधान

Post Views: 16 2019 में शब्दलोक प्रकाशन से छपी किताब ‘सत्ता की सूली’ को तीन पत्रकारों ने मिलकर लिखा है। इस किताब ने वर्तमान पत्रकारिता को चारण गाथा होने से…

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भौतिकवाद को हिंदी में विकसित और स्थापित करने का समर – गोपाल प्रधान

Post Views: 8 हिंदी भाषा में कुछ भी वैचारिक लिखने की कोशिश खतरनाक हो सकती है। देहात के विद्यार्थियों के लिए कुंजी लिखना ही इस भाषा का सर्वोत्तम उपयोग है।…

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धर्मवीर भारती – ठेले पर हिमालय

कल ठेले के बर्फ को देखकर वे मेरे मित्र उपन्‍यासकार जिस तरह स्‍मृतियों में डूब गए उस दर्द को समझता का ही बहाना है। वे बर्फ की ऊँचाईयाँ बार-बार बुलाती हैं, और हम हैं कि चौराहों पर खड़े, ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ (वृतांत से ही )

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अपनी-अपनी हैसियत- हरिशंकर परसाई

फूहड़पन के लिए भी हैसियत चाहिए। मेरी हैसियत नहीं है तो लालाजी के बेटों पर हँस रहा हूँ। पैसा और फूहड़पन दोनों आ जाए तो मैं गहरा रंग खरीदकर चेहरे को रँगवा लूँ-एक गाल पीला, दूसरा लाल नाक हरी, कपाल नीला।।  (लेख से )

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लोकगाथा का सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ – कमलानंद झा

रचनाकारों को काव्य रचना के नए-नए विषय ढूंढें नहीं मिलते, वहीं इन लोकगाथाओं में विषय-विविधता और उसकी नवीनता चमत्कृत करती है।

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महाकवि चतुर्मुख स्वयंभू – राहुल सांकृत्यायन

मैं समझता हूं कि वह समय जल्दी आयेगा, जब हमारे साहित्यिकों के लिए स्वयंभू का पढ़ना अनिवार्य हो जायेगां। मैंने अपनी “हिन्दी काव्यधारा” में स्वयंभू के काफी उद्धरण दिये हैं। लेकिन हिन्दी वालों का उचित योग होगा-यदि वे स्वयंभू की “रामायण” और हरिवंश पुराण (कृष्णचरित) को पूरा देखना चाहें। (लेख से)

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विज्ञापन सुंदरी- लीलाधर जगूड़ी

Post Views: 13 विज्ञापन सुंदरी द्वारा प्रस्तुत करने योग्य बनाया जायेगा इस जीवन को हमको इसमें क्या देखना क्या समझना है, एक तो यह कि जीवन और ज़रूरतों के हम…

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पोस्टर और आदमी- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

Post Views: 35 मैं अपने को नन्हा-सा, दबा हुआ विशालकाय बड़े-बड़े पोस्टरों के अनुपात में खड़ा देख रहा हूँ, जिनकी ओर एक भीड़ देखती हुई गुज़र रही है, हँसती, गाती,…