Tag Archives: साहित्य विमर्श

चेतना का रचनाकार तारा पांचाल

रविंन्द्र गासो                हरियाणा में लिखे जाने वाला साहित्य राष्ट्रीय विमर्शों में कम ही शामिल रहा। इसके कारण, कमियां या उपेक्षा अलग चर्चा का विषय है। इस सब में हरियाणा की रचनाधर्मिता का माकूल जवाब देने में तारा पांचाल का अकेला नाम ही काफी है। बेशक और ज्यादा नाम नहीं हैं। कई पक्ष-कारण हैं।

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सरबजीत, तारा पांचाल और पिलखन का पेड़

ओमसिंह अशफाक सरबजीत (30-12-1961—13-12-1998) दोस्तों का बिछडऩा बड़ा कष्टदायक होता है। ज्यों-ज्यों हमारी उम्र बढ़ती जाती है पीड़ा सहने की शक्ति भी क्षीण होती रहती है। जवानी का जोश तो बड़े-बड़े सदमें झेल जाता है, परन्तु उम्र के साथ ज्यों-ज्यों शारीरिक क्षमता घटती है, त्यों-त्यों मनोबल पर भी नकारात्मक प्रभाव बढ़ता जाता है और दुख हमें तोडऩे लगता है। कुछ

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दास्तान एक शहर की

ओमसिंह अशफाक  दास्तान- ए -शहर कैसे बयां करूं जीऊँ तो कैसे जीऊँ, मरूँ तो कैसे मरूँ मैं सन् 1984 में इस शहर में आया तो इसे आदतन शहर कहकर अपने कहे पर पुनर्विचार करना पड़ता था। बेशक जिला मुख्यालय तो यह 1973 में ही बन गया था, पर किसी भी कोण से शहर की शक्ल तब तक नहीं बन सकी

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और सफर तय करना था अभी तो, सरबजीत!

ओम प्रकाश करुणेश  (कथाकर व आलोचक सरबजीत की असामयिक मृत्यु पर लिखा गया संस्मरण) सरबजीत के साथ पहली मुलाकात ठीक ठाक से तो याद नहीं, पर खुली-आत्मीय भरी मुलाकातें…बाद तक भी कुुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के हिन्दी-विभाग में डॉ. ओमानन्द सारस्वत के यहां हुई। तब मैं यहां शोध-छात्र था। संभवत: तारा की मुलाकात भी यहीं आर्टस फैकल्टी में हुई। (तब तारा लायब्रेरी साईंस

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तरक्कीपसंद शायर आबिद आलमी की ग़ज़लगोई

आलेख ज्ञान प्रकाश विवेक देश का विभाजन एक न भूलने वाली घटना थी। यह एक ऐसी त्रासदी थी, जिसने भूगोल ही नहीं, अवाम को भी तकसीम करके रख दिया। जो उधर से लोग विस्थापित होकर इधर आए, उन्हें शरणार्थी कहा गया। जो यहां से पाकिस्तान जा बसे वो मोहाजि़रों की तरह जीवन जीने को अभिशप्त रहे। विस्थापन ने अजीब-सी वेदना

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