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मुक्तिबोध : एक संस्मरण – हरिशंकर परसाई

Post Views: 13 भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध जब मौत से जूझ रहे थे, तब उस छटपटाहट को देखकर मोहम्मद अली ताज ने कहा था – उम्र भर जी के भी न जीने का अन्दाज आयाजिन्दगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज आया जो मुक्तिबोध…

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प्रसाद : जैसा मैंने पाया – अमृतलाल नागर

Post Views: 11 प्रसादजी से मेरा केवल बौद्धिक संबंध ही नहीं, हृदय का नाता भी जुड़ा हुआ है। महा‍कवि के चरणों में बैठकर साहित्‍य के संस्‍कार भी पाए हैं और…

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मानस’ की धर्म-भूमि – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

Post Views: 19 धर्म की रसात्मक अनुभूति का नाम भक्ति है, यह हम कहीं पर कह चुके हैं। धर्म है ब्रह्म के सत्स्वरूप की व्यक्त प्रवृत्ति, जिसकी असीमता का आभास…

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राष्ट्र का स्वरूप – वासुदेव शरण अग्रवाल

Post Views: 54 भूमि, भूमि पर बसने वाला जन और जन की संस्कृति इन तीनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है। भूमि का निर्माण देवों ने किया है,…

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सूफीवाद की सार्थकता और प्रासंगिकता -प्रेम सिंह

Post Views: 8 (1) मानव सभ्यता के साथ किसी न किसी रूप में धर्म जुड़ा रहा है। आधुनिक काल से पूर्व युगों में सृष्टि की रचना एवं संचालन की परम-सत्ता…

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क्रोध – रामचन्द्र शुक्ल  

Post Views: 7 क्रोध दु:ख के चेतन कारण से साक्षात्कार या अनुमन से उत्पन्न होता है। साक्षात्कार के समय दु:ख और उसके कारण के संबंध का परिज्ञान आवश्यक है। तीन…

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जाति और वर्ण इतिहास पर पर्दा क्यों ? – रजनी दिसोदिया

भारत की सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए उपयोगी लेख है। जाति का उद्भव कैसे हुआ और जाति के निर्माण का आधार क्या है? इस मुद्दे पर भी लेखिक ने विस्तारपूर्वक विचार किया है।

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साम्प्रदायिकता और संस्कृति- प्रेमचंद

जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है, न ज़रूरत। ‘संस्कृति’ अमीरों का, पेटभरों का, बेफ़िक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राण-रक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है। उस संस्कृति में था ही क्या, जिसकी वे रक्षा करें। जब जनता मूर्छित थी तब उस पर धर्म और संस्कृति का मोह छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों उसकी चेतना जागृत होती जाती है, वह देखने लगी है कि यह संस्कृति केवल लुटेरों की संस्कृति थी, जो राजा बनकर, विद्वान बनकर, जगत सेठ बनकर जनता को लूटती थी। (लेख से )

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एक कुत्ता और एक मैना- हजारी प्रसाद द्विवेदी

एक दिन वह मैना उड़ गई। सायंकाल कवि ने उसे नहीं देखा। जब वह अकेले आया करती है उस डाल के कोने में; जब झींगुर अन्धकार में झनकारता रहता है, जब हवा में बाँस के पत्ते झरझराते रहते हैं, पेड़ों की फाँक से पुकारा करता है नींद तोड़नेवाला सन्ध्यातारा! कितना करुण है, उसका गायब हो जाना! (लेख से)