Tag Archives: साहित्य

तरक्की का दौर

विनोद सिल्ला कविता तरक्की के दौर में गुम हो गया भाईचारा टूट गई स्नेह की तार व्यक्ति का नाम छिप गया सरनेम की आड़ में पड़ोसी हो गए प्रतिद्वंद्धी रिश्तेदार भी हो गए मौकापरस्त स्वार्थ की भावना हो गई बलवती इस तरक्की के दौर में जाने क्या-क्या होना बाकी है सम्पर्क-. 09728398500

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दो मुंह वाला देवता

अमृत लाल मदान                 मामी जी को दो दिनों के लिए तावडू वापिस जाना पड़ा, जहां जाकर उन्हें अपने और मामा जी के मैले कपड़े धोने थे, धुले और कपड़े अस्पताल लेकर आने थे तथा कुछ अन्य जरूरी घरेलू कार्य करने थे। क्योंंकि मैं उनके साथ पूरे चौबीस घंटे दिल्ली के इस बड़े अस्पताल में बिता चुका था, मुझे मरीज

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लड़की जो कर सकती है अमा अता आयडू, अनु.- विपुला

अफ्रीकी कहानी उनका कहना है कि मेरा जन्म घाना के मध्यभाग में स्थित एक बड़े गांव हसोडजी में हुआ। वे ऐसा भी कहते हैं कि जब सारा अफ्रीका सूखा-ग्रस्त था, तो हमारा गांव उपजाऊ माने जाने वाले राज्य की उपजाऊ तलहटी में बसा था। इसलिए मैं जब खाने में से कुछ जूठन छोड़ देती थी तो मेरी नानी कहती कि

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फेस बुक – गंगा राम राजी

कहानी उठते ही मोबाइल पकड़ने लगा हूं। पकड़ने क्या अपने आप ही हाथ मोबाइल पर चला जाता है ठीक उसी तरह से जैसे सिग्रेट के प्यक्कड़ का हाथ सिग्रेट की डिबिया पर चला जाता है और धीरे धीरे बाथ रूम जाने से पहले दो चार कश इधर उधर धुंआ न छोड़ा हो तो पेट भी साफ होने का नाम नहीं

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तुम कबीर न बनना- हरभजन सिंंह रेणु

    कविता जब मेरे दोस्त मुझे कबीर बना रहे थे मैं प्यादों की ताकत से ऊंटों की शह मात बचा रहा था घोड़े दौड़ा रहा था तभी मेरे भीतर बैठा कबीर कह  रहा था तुम कबीर मत बनना। ये अक्षरों गोटियों का खेल त्याग और मेरे साथ ताणा बुन ध्यान दे घर का गुजारा चलाती लोई का कमाले को

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हरभजन रेणु सिंह – कहा था न

कविता मैंने तुम्हें कहा था न मत कर कबीर-कबीर और अब शहर के बाहर खड़ा रह अकेला। अपने फुंके घर का देख तमाशा हक सच की आवाज लगाता पंजाबी से अनुवाद :  गीता ‘गीतांजलि’ स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -22

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हरभजन सिंंह रेणु- ठीक कहा तुमने

कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं रचते-गाते मंत्र जपते पढ़ते हैं, बंद कमरों में छिपकर शब्दों के हथियार घड़ते हैं, सिद्धांतों के घोड़ों पर सवार स्वयं से लड़ते स्वंय ही जीतते-हारते और इस तरह सच्ची-झूठी लड़ाई

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एकला चलो, एकला चलो रे – गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर

यदि तोर डाक सुने केउ न आसे तबे एकला चलो रे, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे। यदि केउ कथा न कय, ओरे ओ अभागा यदि सबाई थाके मुख फिराये, सबाई करे भय तबे परान खुले ओरे तुई मुख फुटे तोर मनेर कथा, एकला बोलो रे !ऑ यदि सबाई फिरे जाय, ओरे ओ अभागा! […]

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