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काँशीराम :  दलित आक्रोश का रचनात्मक उपयोग

सन् 1980 में उन्होंने ‘अम्बेडकर मेला’ नाम से पद यात्रा शुरू की। इसमें अम्बेडकर के जीवन और उनके विचारों को चित्रों और कहानी के माध्यम से दर्शाया गया। इसके पश्चात काँशीराम ने अपना प्रसार तंत्र और भी मजबूत किया और जाति-प्रथा के संबंध में अम्बेडकर के विचारों का लोगों के बीच सुनियोजित ढंग से प्रचार किया।

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एस.एन. सुब्बाराव : एक हठी गाँधीवादी

निश्चय ही चंबल क्षेत्र में सुब्बाराव ने जो काम किया, वह अनोखा था। सरकार करोड़ों रुपये खर्च करके और भारी पुलिस-बल लगाने के बाद भी जो नहीं कर सकी उसे सुब्बाराव ने गाँधी मार्ग पर चलकर संभव बना दिया।

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एम.एस.स्वामीनाथन : हरित क्रान्ति के जनक

डॉ. स्वामीनाथन के नेतृत्व में कृषि के क्षेत्र में क्रान्तिकारी अनुसंधान से भारत अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना। इंदिरा गाँधी ने इन पर एक डाक टिकट भी जारी किया। उन्हें अप्रैल 1979 में योजना आयोग का सदस्य बनाया गया। 1982 तक वे योजना आयोग में रहे। उनके कार्यों को हर जगह सराहा गया।

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एपीजे अब्दुल कलाम : जनता के राष्ट्रपति

यदि भारत का सही ढंग से विकास हुआ, सबको उसका लाभ मिला तो 2020 तक, “भारत के लोग ग़रीब नहीं रहेंगे, वे लोग तरक्की के लिए अधिक कुशलता से काम करेंगे और हमारी शिक्षा व्यवस्था भी और बेहतर होगी। ये सपना नहीं बल्कि हम सभी लोगों के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए।

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ए.के.रॉय : साम्यवादी संत

वे सांसद थे तब भी सामान्य डिब्बों में सफर करते थे। आदिवासियों के गांवों में जाते थे तो उनका हाल देखकर रो पड़ते थे। कहते थे कि इन गरीबों पर मुकदमा हो जाए तो पुलिस तुरंत पकड़ती है। माफिया के लिए वारंट निकलते हैं, तो भी वे धन बल के कारण आराम से घूमते हैं। 

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ईएमएस नंबूदिरीपाद : दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री

ईएमएस ने जोर दे कर कहा था कि जातिगत शोषण ने केरल की नंबूदिरी जैसी शीर्ष ब्राह्मण जाति तक का अमानवीयकरण कर दिया है। उन्होंने ‘नंबूदिरी को इंसान बनाओ’ का नारा देते हुए ब्राह्मण समुदाय के लोकतंत्रीकरण की मुहिम चलाई। यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे खुद इसी जाति से आते थे।

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इला रमेश भट्ट : ‘सेवा’ से दूसरी आजादी तक

रोजमर्रा के जीवन में कितनी ही बार हमारा सामना ऐसी महिलाओं से होता है, जो घरों में झाड़ू-पोंछा करके या फुटपाथ पर सब्जियाँ बेचते हुए अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं। हम इतने व्यस्त होते हैं कि इनके चेहरे पर उम्र से पहले ही खिंच आईं प्रौढ़ता की लकीरों के पीछे छिपे दर्द को महसूस नहीं कर पाते। लेकिन अहमदाबाद की इला रमेश भट्ट ने स्वरोजगार से जुड़ी महिलाओं के इस दर्द को समझा।

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इला मित्र  : तेभागा की रानी माँ

देश विभाजन के बाद 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति पाकिस्तान सरकार के सख्त रवैये के कारण वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी ने भूमिगत होकर कार्य करने का निर्णय लिया। इला मित्र सहित  सभी नेताओं को भूमिगत हो जाने को कहा गया। इला मित्र उन दिनों गर्भवती थीं। वे छिपकर बार्डर पार करके कलकत्ता आ गईं और यहाँ अपने बेटे मोहन को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने अपने बेटे को अपनी सास के पास रामचंद्रपुर में छोड़ा और तीन-चार सप्ताह बाद फिर से अपने पति के साथ नचोल किसान आन्दोलन में शामिल हो गईं।

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  इरोम शर्मिला : भारत का सबसे लंबा अनशन    

इरोम शर्मिला का लम्बा अनशन हमें इस बात पर पुनर्विचार के लिए भी मजबूर करता है कि गुलामी के दिनों में महात्मा गाँधी द्वारा अहिंसात्मक आन्दोलन का यह हथियार आजाद भारत में कितना कारगर है ? यह हथियार किस तरह अपना प्रभाव खो चुका है ?

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अरुणा आसफ अली : 1942 की रानी झाँसी

महात्मा गांधी ने उन्हें पत्र लिखकर आत्म-समर्पण करने और आत्म-समर्पण के एवज में मिलने वाली धनराशि को हरिजन अभियान के लिए उपयोग करने को कहा, किन्तु अरुणा आसफ अली ने आत्म-समर्पण नहीं किया। वर्ष 1946 में जब उन्हें गिरफ्तार करने का वारंट रद्द किया गया तब जाकर अरुणा आसफ अली ने आत्मसमर्पण किया।