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किसान आंदोलन और लोकतंत्र – गोपाल प्रधान

Post Views: 12 आखिरकार देश के प्रधानमंत्री ने किसान आंदोलन के सवाल पर जो वैचारिक अभियान शुरू किया उससे ही बात शुरू करना उचित होगा । कारण कि देश के…

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डी.आर. चौधरी होने के मायने – सुरेंद्र पाल सिंह

Post Views: 295 2 जून को अलसुबह रोहतक से एक अजीज का फोन आया कि डी.आर. चौधरी का शायद इंतकाल हो चुका है। मेरे दिल ने तुरंत शायद को यकीन…

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डॉक्टर महावीर नरवाल

Post Views: 35 जीवन के संग्राम और समाज बदलने के संघर्ष में कभी हार न मानने वाले डॉक्टर महावीर नरवाल सांसों की लड़ाई हार गए। उन्होंने रोहतक के पोजीट्रॉन अस्पताल…

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वर्तमान किसान आंदोलन: एक नज़र- सुरेन्द्र पाल सिंह

हिंदू- मुस्लिम- सिक्ख ने अपनी अपनी नकारात्मक विरासतों को पीछे छोड़ते हुए सकारात्मक विरासत को आगे बढ़ाने का जिम्मा लिया है और यही है इस आंदोलन की रीढ़ की हड्डी। (लेख से )

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भारत की कोरोना नीति के चंद नुक्सानदेह पहलू: राजेन्द्र चौधरी

कोरोना से हमारा वास्ता अभी लम्बे समय तक चलने वाला है. काफिला पर छपे पिछले आलेखों में में हम ने इस के सही और गलत, दोनों तरह के सबकों की चर्चा की थी पर भारत की करोना नीति की समीक्षा नहीं की थी. आपदा और युद्ध काल में एक कहा-अनकहा दबाव रहता है कि सरकार को पूरा समर्थन दिया जाए और उस की आलोचना न की जाय पर कोरोना के मुकाबले के लिए भारत में अपनाई गई रणनीति की समीक्षा ज़रूरी है; यह समीक्षा लम्बे समय तक चलने वाली इस आपदा में रणनीति में सुधार का मौका दे सकती है. कोरोना से कैसे निपटना चाहिए इस में निश्चित तौर पर सब से बड़ी भूमिका तो कोरोना वायरस की प्रकृति की है- ये गर्मी में मरेगा या सर्दी में या नहीं ही मरेगा; बूढों को ज्यादा मारेगा या बच्चों को, इन तथ्यों का इस से निपटने की रणनीति तय करने में सब से बड़ी भूमिका है. इस लिए भारत में कोरोना की लड़ाई के मूल्यांकन से पहले हमें वायरस की प्रकृति के बारे में उपलब्ध जानकारी को रेखांकित करना होगा.

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बाज़ारवाद का नीतिगत विरोध नाकाफी, निजी जीवन में भी ज़रूरी-राजेन्द्र चौधरी

लेखक महर्षि दयानंद विश्विद्यालय, रोहतक के पूर्व प्रोफेसर तथा कुदरती खेती अभियान, हरियाणा के सलाहकार हैं.