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सभी तो आदमी हैं – दीपचंद्र निर्मोही

Post Views: 281  कविता मस्तिष्क के किसी कोने में चिपके हैं कई प्रश्रचिन्ह और मैं उदास हूं भीड़ के पास हूं जो निरी तेज दर्द में लिपटी हुई रक्त के

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