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सामाजिक सुरक्षा के नाम पर – रीतिका खेड़ा

अफसोस की बात यह है कि हमारे यहां अभिजात वर्ग के बीच सामाजिक सुरक्षा पर सहमति और समर्थन कमजोर है। हम यह भूल जाते हैं कि खुद की सफलता में सौभाग्य या लॉटरी का उतना ही हाथ है, जितना खुद के जतन या मेहनत का है।

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जागरूकता से ही रोकी जा सकती है एड्स की महामारी – अरुण कुमार कैहरबा

Post Views: 313 दुनिया में एचआईवी/एड्स एक महामारी का रूप लेता जा रहा है। इस जानलेवा विषाणु के बारे में जागरूकता की कमी भारत सहित विकासशील देशों की सबसे बड़ी…

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निजी स्कूल शिक्षा के प्रति बढ़ रहा असंतोष -दीपक राविश

Post Views: 295 वर्तमान समय में निजी स्कूल शिक्षा के प्रति बढ़ रहे असंतोष के दो मुख्य तात्कालिक कारण हैं। पहला समय-समय पर की जाने वाली फीस वृद्धियों से अभिभावकों…

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सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का गिरता स्तर

Post Views: 184 अमरजीत सैनी शिक्षा ही मनुष्य को सही मायने में मानव बनाती है। समय परिवर्तन के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्रों में बहुत परिवर्तन हुए। सरकार ने शिक्षा के…

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एक नदी के गंदे नाले में बदल जाने का सफर – पंकज चतुर्वेदी

Post Views: 464 पंकज चतुर्वेदी आज के हिंदुस्तान के सम्पादकीय पर यह लेख बहुत दुःख के साथ, हमारी काहिली के प्रति रोष के साथ है, काश इस लोकसभा चुनाव में…

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ज़ज़्बे की पाठशालाःगांधी स्कूल रोहतक -नरेश कुमार

Post Views: 584 शिक्षा व्यक्ति व समाज के विकास का माध्यम है। अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ स्कूल में प्रवेश और कक्षा में सर्वोच्च स्थान पर लाने की होड़ इस दौर…

हरियाणा में स्कूली शिक्षा दशा और दिशा- अरुण कुमार कैहरबा

अधिकतर निजी स्कूलों के पास ना तो खेल के मैदान हैं, ना ही बच्चों की संख्या के अनुकूल बड़ा प्रांगण। कमरों के आकार छोटे हैं। कइ अध्यापकों के पास बुनियादी प्रशिक्षण नहीं है। स्कूलों के मालिक और प्रबंधकों की मुनाफाखोरी अलग से आफत है। अधिकतर निजी स्कूलों में पढ़ा रहे प्रशिक्षित और गैर-प्रशिक्षित अध्यापकों का मानदेय इतना कम है कि वे मुश्किल से गुजारा कर पाते हैं। तमाम पहलुओं के बावजूद समय का यथार्थ यही है कि निजी शिक्षा संस्थान लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार द्वारा भी उन्हें संरक्षण दिया जा रहा है। जबकि सरकारी स्कूलों की उपेक्षा हो रही है।

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गांधी स्कूल एक उम्मीद –  नरेश शर्मा

Post Views: 197 पढ़ेंगे पढ़ाएंगे, जीवन सफल बनाएंगे, जहाज भी उड़ाएंगे, हम भी मास्टर बन जाएंगे, लड़का-लड़की एक समान, हम सब एक हैं, जैसे सलोगन प्रवासी मजदूरों के बच्चों के…

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उच्च शिक्षा : अपेक्षाएं और चुनौतियां – डा. सुभाष चंद्र

शिक्षा सांस्कृतिक प्रक्रिया है, समाजीकरण का माध्यम, शक्ति का स्रोत और शोषण से मुक्ति का मार्ग है। शिक्षा का व्यक्ति और समाज के विकास से गहरा रिश्ता है, विशेषकर आज की ज्ञान केन्द्रित व नियन्त्रित दौर में। समाज के विकास और बदलाव के साथ साथ शिक्षा व ज्ञान का चरित्र भी बदला है। शिक्षा-विमर्श के मुद्दे भी बदले हैं।