Tag: लोक धारा

किसानी चेतना के हरियाणवी गीत और रागनियाँ – मंगत राम शास्त्री

मंगत राम शास्त्री- जिला जींद के ढ़ाटरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री (शिक्षा शास्त्री), हिंदी तथा संस्कृत में स्नातकोत्तर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। ज्ञान विज्ञान आंदोलन में सक्रिय भूमिका। “अध्यापक समाज” पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत, रागनी एंव गजल विधा में निरंतर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। “अपणी बोली अपणी बात” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित। … Continue readingकिसानी चेतना के हरियाणवी गीत और रागनियाँ – मंगत राम शास्त्री

सिपाही के मन की बात – मंगतराम शास्त्री

Post Views: 156 कान खोल कै सुणल्यो लोग्गो कहरया दर्द सिपाही का। लोग करैं बदनाम पुलिस का धन्धा लूट कमाई का।। सारी हाणां रहूँ नजर म्ह मेरी नौकरी वरदी की

Continue readingसिपाही के मन की बात – मंगतराम शास्त्री

कर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी – पं. लख्मीचंद

महाभारत में द्रोपदी का एक ऐतिहासिक सवाल किया जो अभी तक अनुत्तरित है।बहुत ही खूब रागनी में पं. लख्मीचंद ने भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक बनावट का स्पष्ट संकेत भी है। … Continue readingकर जोड़ खड़ी सूं प्रभु लाज राखियो मेरी – पं. लख्मीचंद

हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो – पं. लख्मीचंद

जब भी मर्द पर संकट आता है तो स्त्री की गोद ही संबल होती है। कितने ही साहित्यकारों ने इस तरह के भाव प्रकट किए हैं। आमतौर पर लख्मीचंद की रागनियों में स्त्री की छवि पुरुष की सफलता में बाधक की ही है, लेकिन यहां एक स्त्री-स्वर में पं. लख्मीचंद की आत्मा की पुकार उठी है और ऐसा वे इसलिए कर सके कि यहां शास्त्र समर्थित रुढियों के बोझ को उतार फेंका जिसे वे अकसर ढोते रहे थे. … Continue readingहो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो – पं. लख्मीचंद

वा राजा की राजकुमारी मैं सिर्फ लंगोटे आळा सूं – पं. मांगेराम

Post Views: 327 वा राजा की राजकुमारी मैं सिर्फ लंगोटे आळा सूंभांग रगड़ कै पीवणियां मैं कुण्डी सोट्टे आळा सूं उसकी सौ सौ टहल करैं आड़ै एक भी दासी दास

Continue readingवा राजा की राजकुमारी मैं सिर्फ लंगोटे आळा सूं – पं. मांगेराम