Tag Archives: लोकधारा

जाट कहवै, सुण जाटणी

 प्रदीप नील वशिष्ठ आत्मकथ्य एक बात ने कई सालों से मुझे परेशान कर रखा था। और वह शर्म की बात यह कि अपने  हरियाणा में हरियाणवी बोलने वाले को नाक-भौं चढ़ा कर इस नजऱ से देखा जाता है कि इस बेचारे को हिंदी या अंग्रेजी तो आती ही नहीं होगी। और यह या तो कम पढ़ा लिखा होगा या फिर

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लुटी ज्यब खेत्ती बाड़ी

सत्यवीर ‘नाहडिय़ा’ रागनी 1 माट्टी म्हं माट्टी हुवै, जमींदार हालात। करजा ले निपटांवता, ब्याह्-छूछक अर भात। ब्याह्-छूछक अर भात, रात-दिन घणा कमावै। मांह् -पौह् की बी रात, खेत म्हं खड़ा बितावै। खाद-बीज का मोल, सदा हे ठावै टाट्टी। अनदात्ता बेहाल, पिटै चोगरदे माट्टी।। 2 खरचा लग लिकड़ै नहीं, खेत्ती का यो हाल। करजा बढ़ता हे रहै, चूंट बगावै खाल। चूंट

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अंधविश्वास नाश की राही

रामेश्वर दास ‘गुप्त’ रागनी तर्क करूं अर सच जाणूं, ये रहणी चाहिए ख्यास मनै अंधविश्वास सै नाश की राही, बात बताणी खास मनै। भगत और भगवान बीच म्हं, दलाल बैठगे आ कै, कई भेडिये पहन भेड़ की, खाल बैठगे आ कै, भगवान बहाने कई ऊत चाटणे, माल बैठगे आ कै, क्यूं होरी सै खूण्डी लूटयें, सवाल बैठगे आ कै, करणी

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 उल्टे खूंटे मतना गाडै मै त्यरै ब्याही आ रही सूं

रामकिशन राठी (रामकिशन राठी रोहतक में रहते हैं। कहानी लेखक हैं । हरियाणवी भाषा में भी निरतंर लेखन करते हैं और समाज के भूले-बिसरे व अनचिह्ने नायकों पर लेख लिखकर प्रकाश में लाने का महती कार्य करते हैं -सं.) रागनी उल्टे खूंटे मतना गाडै मै त्यरै ब्याही आ रही सूं लोक-लाज तैं डर लागै सै दुनियां तैं सरमा रही सूं

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आपणे की चोट

 राजकिशन नैन (राजकिशन नैन हरियाणवी संस्कृति के ज्ञाता हैं और बेजोड़ छायाकार हैं। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में उनके चित्र प्रकाशित होते रहे हैं।) एक सुनार था। उसकी दुकान के धौरे एक लुहार की दकान बी थी। सुनार जिब काम करदा, तै उसकी दुकान म्हं कती कम खुड़का हुंदा, पर जिब लुहार काम करदा तै उसकी दुकान म्हं तैं कानां के परदे

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सुरेन्द्र पाल सिंह – एक सांड और गधे की मौत

लघु कथा बचपन में हमारे घर के बगल में एक रेलवे लाइन पर फाटक था जिसके पास एक जोहड़ था। शहर भर की गायें दिन भर उस जोहड़ पर कुछ पालियों के द्वारा आराम करने के लिए लायी जाती थी और स्वभाविक है कि उन गायों के झुण्ड में एक सांड भी होता था। एक बार ना जाने कहां से

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कौआ और चिड़िया

लोक कथा                 एक चिड़िया थी अर एक था कौआ। वै दोनों प्यार प्रेम तै रह्या करै थे। एक दिन कौआ चिड़िया तै कहण लाग्या अक् चिड़िया हम दोनों दाणे-दाणे खात्तर जंगलां म्हं फिरैं, जै हम दोनों सीर मैं खेती कर ल्यां तो आच्छा रैगा। चिड़िया भी इस बात पै राजी होग्यी। आगले दिन चिड़िया कौआ तै कहण लाग्यी अक्

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हरियाणा की मशहूर रागनियां

रागनियां रागनियां        प्रिय, पाठको, हम आपके लिये लेकर आ रहे हैं, डा. सुभाष चंद्र द्वारा संपादित पुस्तक – हरियाणवी लोकधारा प्रतिनिधि रागनियां – चुन कर कुछ मशहूर रागनियां। इन रागनियों में हरियाणा जन मानस की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है। रागनी सुनने और पढ़ने के लिये यहां पर क्लिक करें ..हरियाणा में रागनी का विकास सांगों के माध्यम से

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