Tag: लखमीचन्द की रागनियां

हो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो – पं. लख्मीचंद

जब भी मर्द पर संकट आता है तो स्त्री की गोद ही संबल होती है। कितने ही साहित्यकारों ने इस तरह के भाव प्रकट किए हैं। आमतौर पर लख्मीचंद की रागनियों में स्त्री की छवि पुरुष की सफलता में बाधक की ही है, लेकिन यहां एक स्त्री-स्वर में पं. लख्मीचंद की आत्मा की पुकार उठी है और ऐसा वे इसलिए कर सके कि यहां शास्त्र समर्थित रुढियों के बोझ को उतार फेंका जिसे वे अकसर ढोते रहे थे. … Continue readingहो पिया भीड़ पड़ी मैं नार मर्द की खास दवाई हो – पं. लख्मीचंद

हरियाणा में रागनी की परम्परा और जनवादी रागनी की शुरुआत – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

रागनी की असली जान, ठेठ लोकभाषा के मुहावरों में सीधी-सादी लय अपनाने में और ऐसे मर्म-स्पर्शी कथा प्रसंगों के चुनाव में होती हैं ” जो लोगों के मन में रच-बस गये हों। इन सबके सहारे ही रागनी लोगों की भावनाओं को, उनकी पीड़ाओं तथा दबी हुई अभिलाषाओं को सुगम और सरल ढंग से प्रस्तुत करने में सफल होती हैं। … Continue readingहरियाणा में रागनी की परम्परा और जनवादी रागनी की शुरुआत – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल