Tag Archives: रागनी

जय बोलो संत रविदास की

बसाऊ राम करके एकता बात करो सब इकलास की सारे मिले जय बोलो संत रविदास की माह की पूर्णमासी 1433 में जन्में थे आप करमा देवी माता थी रघुजी थे बाप लोना देवी धर्मपत्नी करे भक्ति के जाप रामानंद की सेवा करके सिख लिये जप ताप कबीर भगत बने गुरु माई थी झोंपड़ी घास की दिन रात करे थे भक्ति

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नया साल

रामधारी खटकड़ नया साल जै ऐसा आज्या , खुल कै खुशी मनाऊँ रै सब सुख तै जीवैं , मैं ऐसी दुनिया चाहूँ…(टेक) बेकारी ना हो किते , हर युवा को रुजगार मिलै बेसहारा कोय ना हो , जिम्मेदार सरकार मिलै लावारिस कोय बच्चा ना हो,सबको घर-परिवार मिलै कन्याओं का मान हो जग म्हं,इन्हें सुखी संसार मिलै यारां का कोय यार

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लुटी ज्यब खेत्ती बाड़ी

सत्यवीर ‘नाहडिय़ा’ रागनी 1 माट्टी म्हं माट्टी हुवै, जमींदार हालात। करजा ले निपटांवता, ब्याह्-छूछक अर भात। ब्याह्-छूछक अर भात, रात-दिन घणा कमावै। मांह् -पौह् की बी रात, खेत म्हं खड़ा बितावै। खाद-बीज का मोल, सदा हे ठावै टाट्टी। अनदात्ता बेहाल, पिटै चोगरदे माट्टी।। 2 खरचा लग लिकड़ै नहीं, खेत्ती का यो हाल। करजा बढ़ता हे रहै, चूंट बगावै खाल। चूंट

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अंधविश्वास नाश की राही

रामेश्वर दास ‘गुप्त’ रागनी तर्क करूं अर सच जाणूं, ये रहणी चाहिए ख्यास मनै अंधविश्वास सै नाश की राही, बात बताणी खास मनै। भगत और भगवान बीच म्हं, दलाल बैठगे आ कै, कई भेडिये पहन भेड़ की, खाल बैठगे आ कै, भगवान बहाने कई ऊत चाटणे, माल बैठगे आ कै, क्यूं होरी सै खूण्डी लूटयें, सवाल बैठगे आ कै, करणी

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 उल्टे खूंटे मतना गाडै मै त्यरै ब्याही आ रही सूं

रामकिशन राठी (रामकिशन राठी रोहतक में रहते हैं। कहानी लेखक हैं । हरियाणवी भाषा में भी निरतंर लेखन करते हैं और समाज के भूले-बिसरे व अनचिह्ने नायकों पर लेख लिखकर प्रकाश में लाने का महती कार्य करते हैं -सं.) रागनी उल्टे खूंटे मतना गाडै मै त्यरै ब्याही आ रही सूं लोक-लाज तैं डर लागै सै दुनियां तैं सरमा रही सूं

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अन्नदाता सुण मेरी बात

मंगतराम शास्त्री अन्ऩदाता सुण मेरी बात तूं हांग्गा ला कै दे रुक्का। सारे जग का पेट भरै तूं फेर भी क्यूं रहज्या भुक्खा।। माट्टी गेल्यां माट्टी हो तेरा गात खेत म्हं गळज्या रै सारी उम्र कमाकै मरज्या तेरी ज्यान रेत म्हं रुळज्या रै स्याणा सपटा भुका सिखा तेरी घरवाळी नै छळज्या रै पशु गेल तूं रहै पशु पर दूध ढोल

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एक अरज सुण तूं भाभी

महेन्द्र सिंह ‘फकीर’ एक अरज सुण तूं भाभी, घर मेरा भी बसवा दे, होगा बड़ा भला तेरा, ब्याह मेरा भी करवा दे। एक सूंट तेरा सिमा दूंगा, घर म्हं फोटो टंगवा दूंगा। करुं आरती रोज सेवेरै, शाम नै बती-धूप करा दूंगा। पाणी तेरै भरवा दूंगा, चुल्हा मेरा जळवा दे। जो तुं कहवै जतन करुं, जो तूं चाहवै वचन भरुं, डूब

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बाॅडी साॅडी बणा लई तनै यो किसा ढिठोरा सै

विक्रम राही बाॅडी साॅडी बणा लई तनै यो किसा ढिठोरा सै असल बात तै लाख दूर किस ढाल का छोरा सै जोंगा जीप ट्रैक्टर डीजे बणा लिया तमनै बेहुदा फनकार आईडिल गिणा लिया तमने ताऊ चाच्यां कै तेरी खातिर हाथ लठोरा सै कद्र बाप की ना समझी और माँ किस हाल सै बाहण कै ऊपर लाख नजर यो के जंजाल

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कुर्सी के रोले नै देखो किस ढाल का काम करया

विक्रम राही कुर्सी के रोले नै देखो किस ढाल का काम करया माणस माणस भिडा दिए कैसा यो इंतजाम करया भाई नै भाई की चाहन्ना यो धर्म कड़े तै आग्या जात का अपणा ए झगड़ा जो चौगरदे नै छाग्या हिंदू का मुस्लिम पड़ोसी काम दूसरे के आग्या कोए दूर बैठकै लड़ा रहया भेद तनै ना पाग्या भाई तै भाई पाड

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हरियाणा में रागनी की परम्परा और जनवादी रागनी की शुरुआत

डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल हरियाणा में आम जनता तक पहुंचने के लिए रागनी एक कारगर माध्यम दिखाई देती है। क्योंकि पिछले पचास-साठ सालों के दौरान कुछ प्रमुख लोक-प्रतिभाओं ने इसके विकास में विशेष भूमिका निभाई है, इसलिए रागनी आज हरियाणा में लोक-साहित्य के किसी भी अन्य रूप की तुलना में अधिक जीवन्त और प्रचलित विधा बन गयी है। जब आम लोगों

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