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मैं घर में हूँ कि सफ़र में, हैं बेक़रार बहुत- आबिद आलमी

Post Views: 163 ग़ज़ल मैं घर में हूँ कि सफ़र में, हैं बेक़रार बहुत तलाश में हैं, परेशां हैं, पहरेदार बहुत अब ऐसे जलसों का चल निकला है रिवाज़ यहाँ

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