Tag: मंगत राम शास्त्री

हरयाणवी गज़लें – मंगत राम शास्त्री

Post Views: 154 लम्बे अरसे से मंगत राम शास्त्री हरियाणवी ग़ज़ल लिख रहे हैं। इनकी रचनाओं में पोलिटिकल फंडामेंटलिज्म के प्रति सचेत विरोध है। इसके अलावा शास्त्री की गज़लें अपने

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मणिपुर तै इक विडियो आई दिन धौळी- मंगत राम शास्त्री

मणिपुर में घटी शर्मनाक घटना का दर्द पुरे देश के दिल में है। देश भर में लोग इस घटना के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। हरियाणा के साहित्यकार मंगत राम शास्त्री ने इस व्यथा को एक कविता की शक्ल दी है। इस कविता को चमन ने गाया है। यहाँ आप इस कविता को पढ़ और सुन सकते हैं- … Continue readingमणिपुर तै इक विडियो आई दिन धौळी- मंगत राम शास्त्री

किसानी चेतना के हरियाणवी गीत और रागनियाँ – मंगत राम शास्त्री

मंगत राम शास्त्री- जिला जींद के ढ़ाटरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री (शिक्षा शास्त्री), हिंदी तथा संस्कृत में स्नातकोत्तर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। ज्ञान विज्ञान आंदोलन में सक्रिय भूमिका। “अध्यापक समाज” पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत, रागनी एंव गजल विधा में निरंतर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। “अपणी बोली अपणी बात” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित। … Continue readingकिसानी चेतना के हरियाणवी गीत और रागनियाँ – मंगत राम शास्त्री

दस हरियाणवी गज़लें- मंगत राम शास्त्री

मंगत राम शास्त्री- जिला जींद के ढ़ाटरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री (शिक्षा शास्त्री), हिंदी तथा संस्कृत में स्नातकोत्तर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। ज्ञान विज्ञान आंदोलन में सक्रिय भूमिका। “अध्यापक समाज” पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत, रागनी एंव गजल विधा में निरंतर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। “अपणी बोली अपणी बात” नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित। … Continue readingदस हरियाणवी गज़लें- मंगत राम शास्त्री

मैं टोहूं वो हरियाणा जित दूध-दही का खाणा है- मंगत राम शास्त्री

Post Views: 198 मंगत राम शास्त्री देशां में सुण्या देश अनोखा वीर देश हरियाणा है। मैं टोहूं वो हरियाणा जित दूध-दही का खाणा है।। था हरियाणा हिन्दू-मुस्लिम मेलजोल की कहाणी

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इसा गीत सुणाओ हे कवि- मंगत राम शास्त्री

Post Views: 268 मंगत राम शास्त्री  इसा गीत सुणाओ हे कवि! होज्या सारै रम्मन्द रोळ, उट्ठे चोगरदै घमरौळ इसा राग्गड़ गाओ हे कवि! माच्ची उथल-पुथल सारै कोए झूठ और साच

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