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बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

Post Views: 14 कविता बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!पूछेगा सारा गाँव, बंधु! यह घाट वही जिस पर हँसकर,वह कभी नहाती थी धँसकर,आँखें रह जाती थीं फँसकर,कँपते थे दोनों पाँव…