Tag Archives: प्रेमचंद

धर्म और कार्ल मार्क्स

जगदीश्वर चतुर्वेदी अनेक लोग हैं जो कार्ल मार्क्स के धर्म संबंधी विचारों को विकृत रूप में व्याख्यायित करते हैं। वे मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं को गलत देखते हैं फिर सभी मार्क्सवादियों पर हमला आंरंभ कर देते हैं। सवाल यह है क्या मार्क्स की धर्म संबंधी मान्यताओं से धर्म की कोई सही समझ बनती है ?क्या दुनिया में मार्क्सवादी धर्म

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मैं क्यों लिखता हूँ

ओम सिंह अशफाक मैं क्यों लिखता हूँ?-इस सवाल का जवाब बहुत सरल भी हो सकता है और जटिल भी। सरल इस तरह कि जैसे हर इंसान भोजन करता है, सोता है, जागता है, चलता-फिरता है, उठता-बैठता है, नहाता-धोता है, सोचता-विचारता है, बातचीत करता है यानि दैनिक जीवन के सभी कार्य-कलाप करता है, वैसे ही लिखता भी है। अब आप कह

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डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल व रमेश उपाध्याय का पत्र-व्यवहार

ई-16, यूनिवर्सिटी कैम्पस, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)-132119 30 अगस्त 1991 प्रिय भाई रमेश,             आपका पत्र। बीच में एकाध दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। इसीलिए तुरंत जवाब देने की इच्छा के बावजूद इस पत्र को लिखने में कुछ देरी हो गयी। क्षमा करेंगे। कहानी के बारे में, विशेषकर हिन्दी कहानी की पिछले चार दशकों के दौरान विकास यात्रा के बारे में,

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प्रेमचंद – ठाकुर का कुआँ  

कहानी जोखू ने लोटा मुँह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आयी । गंगी से बोला- यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाये देती है ! गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी । कुआँ दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल

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प्रेमचंद – राष्ट्र का सेवक

लघुकथा राष्ट्र के सेवक ने कहा – देश की मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है नीचों के साथ भाईचारे का सलूक, पतितों के साथ बराबरी का बर्ताव। दुनिया में सभी भाई हैं, कोई नीच नहीं, कोई ऊँच नहीं। दुनिया ने जय-जयकार की – कितनी विशाल दृष्टि है, कितना भावुक हृदय! उसकी सुंदर लड़की इंदिरा ने सुना और

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प्रेमचंद – साहित्य का उद्देश्य

साहित्य -चिंतन 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ  के प्रथम अधिवेशन लखनऊ में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण। यह सम्मेलन हमारे साहित्य के इतिहास में स्मरणीय घटना है। हमारे सम्मेलनों और अंजुमनों में अब तक आम तौर पर भाषा और उसके प्रचार पर ही बहस की जाती रही है। यहाँ तक कि उर्दू और हिन्दी का जो आरम्भिक साहित्य मौजूद

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प्रेमचंद – जीवन में साहित्य का स्थान

साहित्य-चिंतन        साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है। उसकी अटरियाँ, मीनार और गुम्बद बनते हैं लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी है। उसे देखने को भी जी नहीं चाहेगा। जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए अनंत है, अगम्य है। साहित्य मनुष्य की सृष्टि है, इसलिए सुबोध है, सुगम है

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मेरी पहली रचना

 प्रेमचंद  उस वक्त मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढऩे-लिखने का उन्माद था। मौलाना शहर, पं. रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मोहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएं जहां मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता

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प्रेमचंद – इंद्रनाथ मदान को पत्र

प्रेमचंद अपनी नज़र मेेंं (कोई रचनाकार-कलाकार स्वयं को कैसे देखता है। यह जानना कम दिलचस्प नहीं होता। यह भी सही है कि किसी लेखक को सिर्फ उसके साहित्य से नहीं जाना जा सकता। 1934 में इंद्रनाथ मदान को लिखे गए ये पत्र विभिन्न विषयों पर प्रेमचंद की राय उन विषयों और स्वयं प्रेमचंद को समझने में मदद करते हैं।) प्रिय

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