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रविन्द्रनाथ टैगोर की कविता – धूलि-मन्दिर

Post Views: 32 भजन-पूजन साधना-आराधना सब-कुछ पड़ा रहे, अरे, देवालय का द्वार बन्द किए क्यों पड़ा है!अँधेरे में छिपकर अपने-आपचुपचाप तू किसे पूजता हैं? आँख खोलकर ध्यान से देख तो सही…