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नज़र की हद से परे अपना हर क़दम निकला- आबिद आलमी

Post Views: 180 ग़ज़ल नज़र की हद से परे अपना हर क़दम निकलावो आसमान हमारे सफ़र को कम निकला न पूछ कैसे मिली मेरे चाराग़र को निज़ातन पूछ कितने तरद्दुद

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