Tag: धर्म और सांप्रदायिकता

इतिहास और पूर्वाग्रह – गणेश देवी

Post Views: 24 अज्ञेयवादी हूँ, लिहाज़ा न तो पूरी तरह आस्तिक हूँ, न धुर नास्तिक। फिर भी, बाज़ दफ़ा ऐसा होता है कि आस्था का प्रश्न अहम हो उठता है।

Continue readingइतिहास और पूर्वाग्रह – गणेश देवी

मैं नास्तिक क्यों हूँ? – भगत सिंह

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।

स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की काल कोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा। … Continue readingमैं नास्तिक क्यों हूँ? – भगत सिंह

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज – भगत सिंह

साम्प्रदायिकता की समस्या के हल के लिए क्रान्तिकारी धारा ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है। … Continue readingसाम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज – भगत सिंह

गाँव एक गुरुद्वारे दो – सुरेंद्र पाल सिंह

बात सामान्य सी है लेकिन सामान्य लगने वाली बातों के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि असामान्य बातें आँखों से ओझल होनी शुरू हो जाती हैं। हिंदू मन्दिर तो सदियों से केवल द्विजों के लिए ही शास्त्रसम्मत विधान से बनते रहे हैं लेकिन कोई गुरुद्वारा जब समुदाय के आधार पर बने तो सवालिया निशान लगना वाजिब है। मगर जब कोई बात आम हो जाए तो खास नहीं लगती। फिर भी आम के पीछे छुपे हुए खास को देखना आवश्यक है जिससे हमें सामाजिक डायनामिक्स की शांत और सहज दिशा और दशा का भान होता है। … Continue readingगाँव एक गुरुद्वारे दो – सुरेंद्र पाल सिंह

‘हम भारत के लोग‘ और आप बाबा साहब? – कनक तिवारी

बाबा साहब! ताजा इतिहास में गांधी सुकरात की तरह सत्य के उपासक, नेहरू प्लेटो की तरह गणतंत्र के रचयिता और आप पूरा ज्ञानशास्त्र विवेक, जेहन और कर्म में बिखेरते महान अरस्तू की भूमिका में रहे। तीनों हमारी आत्मा के रचयिता नहीं होते, तो ‘हम भारत के लोग‘ गोरों की गुलामी से कहां छूटते। गांधी और नेहरू ने इतिहास की खुर्दबीन से तुम्हें ढूंढ़कर नायाब हीरा निकाला। … Continue reading‘हम भारत के लोग‘ और आप बाबा साहब? – कनक तिवारी

सांप्रदायिक समस्या का हल – महात्मा गांधी

Post Views: 295 हिंदू इतिहासकारों ने और मुसलमान इतिहासकारों ने पक्के-से-पक्के प्रमाण देकर हमें बताया है कि तब भी हम आज के मुकाबले ज्यादा मेल-मुहब्बत के साथ रह रहे थे

Continue readingसांप्रदायिक समस्या का हल – महात्मा गांधी

महात्मा गांधीः धर्म और साम्प्रदायिकता – डा. सुभाष चंद्र

Post Views: 1,034 साम्प्रदायिकता आधुनिक युग की परिघटना है। अंग्रेजों ने भारत की शासन सत्ता संभाली तो राजनीति और आर्थिक व्यवस्था प्रतिस्पर्धात्मक हो गई। अंग्रेजी शासन में हिन्दुओं व मुसलमानों

Continue readingमहात्मा गांधीः धर्म और साम्प्रदायिकता – डा. सुभाष चंद्र

मैं हिन्दू भी हूं और मुसलमान भी

Post Views: 312 विनोबा भावे रामकृष्ण परमहंस ने इस्लाम, ईसाई आदि अन्य धर्मों की उपासना की थी, उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति प्राप्त करने के लिए साधना की थी और सब धर्मों

Continue readingमैं हिन्दू भी हूं और मुसलमान भी

पंज प्यारे – जातिवाद पर कड़ा प्रहार और जनवाद का प्रतीक

अपना शीश देने के लिए तैयार हुए पांचों व्यक्तियों में से ज्यादा समाज द्वारा नीची समझी जाने वाली जातियों में थे और खासतौर पर दस्तकार थे। उनमें से एक खत्री था, एक जाट, एक धोबी, एक नाई और एक कुम्हार था। इस से पता चलता है कि गुरु गोबिंद सिंह जी को तमाम जातियों और खासकर छोटी समझी जाने वाली जनता का अपार समर्थन था। उसे मेहनतकश किसान और मजदूरों का समर्थन हासिल था। उसे व्यापारी वर्ग का समर्थन था। … Continue readingपंज प्यारे – जातिवाद पर कड़ा प्रहार और जनवाद का प्रतीक

समानान्तर सत्ता के द्वीप -मुकेश

Post Views: 498 साढ़े दस साल पहले रोहतक के करौंथा आश्रम व आर्य समाजियों में भी खूनी संघर्ष हुआ था। सेना बुलाकर आश्रम को खाली कराया गया था। बाबा की

Continue readingसमानान्तर सत्ता के द्वीप -मुकेश