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तुम्हें ग़र अपनी मंजि़ल का पता है फिर खड़े क्यों हो – बलबीर सिंह राठी

Post Views: 581 ग़ज़ल तुम्हें ग़र अपनी मंजि़ल का पता है फिर खड़े क्यों हो, तुम्हारा कारवां1 तो जा चुका है फिर खड़े क्यों हो। उजाला तुम तो ला सकते

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