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धर्मवीर भारती – ठेले पर हिमालय

कल ठेले के बर्फ को देखकर वे मेरे मित्र उपन्‍यासकार जिस तरह स्‍मृतियों में डूब गए उस दर्द को समझता का ही बहाना है। वे बर्फ की ऊँचाईयाँ बार-बार बुलाती हैं, और हम हैं कि चौराहों पर खड़े, ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ (वृतांत से ही ) … Continue readingधर्मवीर भारती – ठेले पर हिमालय